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मानवता: दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए भी लंबा इंतजार, सरकारी मदद फिलहाल नाकाफी 

Thu, 24 Mar 2022 09:38 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मौजूदा हालात देखकर ऐसा लगता है कि दुर्लभ बीमारियों के लिए बजटीय आवंटन इस वर्ष भी बिना खर्च के रहने की संभावना है।  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : social media
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विस्तार
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दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों को खास देखभाल, इलाज और सरकार की ओर से मदद की जरूरत होती है। ऐसी ही एक दुर्लभ बीमारी है लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (एलएसडी) जैसे पोम्पे रोग, गौचर रोग, एमपीएस I और फैब्री रोग। इनसे पीड़ित मरीज हालांकि लंबे इलाज के बाद ठीक हो जाते हैं और लगभग सामान्य जीवन जीते हैं, बशर्ते उन्हें समय पर जीवन रक्षक एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी (ईआरटी) मिल जाए। 

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देश में ऐसे मरीज अपने इलाज के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। जब भारत सरकार ने मार्च 2021 में दुर्लभ बीमारियों के लिए लंबे समय से लंबित राष्ट्रीय नीति को अंतिम रूप दिया और अधिसूचित किया तो ऐसे रोगियों और परिजनों को लगा कि आखिरकार इनका इंतजार खत्म हो गया है। लेकिन ऐसे रोगियों, विशेष रूप से समूह 3 (ए) मरीजों जिन्हें दीर्घकालीन समर्थन और सहयोग की जरूरत है, उनके वित्त पोषण की जिम्मेदारी के प्रति उदासीनता बरती जा रही है।  

मरीजों की सहायता के लिए क्राउडफंडिंग पोर्टल पिछले साल अगस्त में लॉन्च किया गया था लेकिन 236 मरीजों के लिए केवल 1.18 लाख रुपये ही जुट सके। इस बीच तीन बच्चों की पहले ही मौत हो चुकी है, बाकी मरीजों की तबीयत बिगड़ती जा रही है। अगर समय पर इलाज नहीं कराया गया तो इन मरीजों और उनके परिवारों को मजबूरी का सामना करना पड़ेगा। 
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मरीजों के लिए चिंतित समूहों और संसद सदस्यों द्वारा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से बार-बार अपील करने के बावजूद कि समूह 3 की स्थिति से पीड़ित रोगियों के लिए राष्ट्रीय आरोग्य निधि (आरएएन) की अम्ब्रेला योजना का विस्तार किया जाए, ऐसा लगता है कि दुर्लभ बीमारियों के लिए बजटीय आवंटन इस वर्ष भी बिना खर्च के रहने की संभावना है।  

तीन बच्चों की पहले ही मौत हो चुकी है। इन तीन मरीजों के आवेदन मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली, पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ और सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स, हैदराबाद द्वारा राष्ट्रीय मंच पर रखे गए थे। इनके उपचार के लिए धन की मांग की गई, लंबे समय तक इंतजार भी किया गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

यहां जिक्र करना जरूरी है कि भारत सरकार ने 2018-19 से दुर्लभ बीमारियों के लिए 202 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की थी, जिसमें से अब तक केवल 11 करोड़ रुपये का ही उपयोग किया गया है। 2021-22 के बजट अनुमान के रूप में अलग रखे गए 25 करोड़ रुपये में से 4 करोड़ रुपये की राशि कर्नाटक में समूह 3 (ए) के रोगियों के इलाज के लिए दी गई थी।

वर्तमान में यह योजना समूह 1 के रोगियों को केवल 20 लाख रुपये का एकमुश्त अनुदान प्रदान करती है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने समूह 3 (ए) के कुछ रोगियों के लिए अपवादस्वरुप कदम उठाए, जिनमें यवतमाल (महाराष्ट्र) के गौचर I रोगी 26 वर्षीय चैतन्य प्रकाश अवठेरे आरएएन की अम्ब्रेला योजना के तहत सहायता मिली। कर्नाटक और तमिलनाडु के मरीजों का भी ऐसा ही मामला है। इन पात्र रोगियों को आरएएन के तहत जीवन रक्षक एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी (ईआरटी) का समय पर उपचार प्राप्त करने में मदद मिलेगी।  

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