एक संसदीय समिति की सिफारिश मानी गई तो आगे से देश के सभी हाईकोर्ट के जजों की सेवानिवृत्ति भी 62 वर्ष की बजाय 65 साल की उम्र में होगी। सेवानिवृत्ति की आयु सीमा बढ़ाए जाने की सिफारिश करने वाली स्थायी समिति का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की सेवानिवृत्ति की आयु एकसमान होनी चाहिए।
कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति के सदस्यों का मानना है कि हाईकोर्ट में जजों के बड़ी संख्या में रिक्त पड़े पदों को ध्यान में रखकर सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने पर विचार करने की जरूरत है।
समिति ने पाया कि सुप्रीम कोर्ट में 12 फीसदी और विभिन्न हाईकोर्ट में 39 फ़ीसदी जजों के पद इस समय खाली हैं। जजों के रिक्त पद और सभी हाईकोर्ट में भारी संख्या में लंबित मामलों पर गौर करने के बाद समिति के सदस्यों का मानना है कि जजों के कार्य दिवस को बढ़ाकर विभिन्न स्तरों पर लंबित मुकदमों की कतार से निपटा जा सकता है।
समिति का कहना है कि न्याय व्यवस्था उस स्थिति में पहुंच गई है, जहां जजों की रिक्तियां और लंबित मामलों की संख्या हर साल बढ़ती ही जा रही है। इससे आम लोगों का न्याय व्यवस्था से भरोसा घटने का खतरा पैदा हो गया है।
समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि जब सुप्रीम कोर्ट के जज 65 वर्ष की आयु तक काम कर सकते हैं तो हाईकोर्ट के जजों को 62 वर्ष में ही सेवानिवृत्त करने का कोई तार्किक कारण नहीं दिखाई देता। इसी कारण समिति ने न्याय विभाग से सिफारिश की है कि हाईकोर्ट के जजों की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष कर दी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट में लंबित हैं 57 लाख मुकदमे
न्याय विभाग के 28 फरवरी 2021 तक के आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में करीब 4.34 करोड़ मुकदमे लंबित हैं। इनमें से 3.77 करोड़ अधीनस्थ न्यायालयों में, जबकि 57 लाख विभिन्न हाईकोर्ट में और 66 हजार मुकदमे सुप्रीम कोर्ट में निर्णय की बाट जोह रहे है।
बड़ा अंतर
- 1080 जजों के पद स्वीकृत हैं देश के विभिन्न हाईकोर्ट में।
- 661 जज ही काम कर रहे हैं सभी हाईकोर्ट में मिलाकर।
- 419 पद जजों की नियुक्ति की बाट जोह रहे हैं हाईकोर्ट में।