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मानसून सत्र: संसद के दोनों सदनों में सियासी तकरार; हंगामे से 166 घंटे बर्बाद, जनता के टैक्स के 248 करोड़ डूबे

Fri, 22 Aug 2025 08:01 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

संसद का मानसून सत्र स्थगित हो चुका है। हंगामे से संसद के 166 घंटे बर्बाद हो गए। दोनों सदनों में हंगामे और शोरगुल के कारण जनता के टैक्स के 248 करोड़ डूब गए। अंतिम नौ कार्य दिवसों में लोकसभा में 12, तो राज्यसभा में 15 विधेयक पारित हुए। एसआईआर और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे पर पूरे सत्र में सियासी संग्राम हुआ।
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संसद के मानसून सत्र में कामकाज की झलकियां - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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ऑपरेशन सिंदूर से लेकर बिहार में मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर हुए हंगामे के साथ संसद का मानसून सत्र बृहस्पतिवार को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। यह सत्र सरकार और विपक्ष के बीच लगातार टकराव, अंतिम दो सप्ताह में थोक में निपटाए गए विधायी कामकाज, जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद से अचानक इस्तीफे और जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू करने के कारण चर्चा में रहा।
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एसआईआर पर विपक्ष के हंगामे के कारण संसद के 166 घंटे बर्बाद हो गए। इससे जनता के टैक्स के करीब 248 करोड़ रुपये डूब गए। विशेष चर्चा के बाद ऑपरेशन सिंदूर मामले में टकराव टला, मगर एसआईआर को लेकर सियासी संग्राम अंतिम दिन तक जारी रहा। हंगामे के कारण लोकसभा के 84.5 घंटे, जबकि उच्च सदन राज्यसभा के 81.12 घंटे बर्बाद हो गए। राज्यसभा की कार्यवाही 38.88 घंटे ही चल सकी।

किसी भी सदन की एक मिनट की कार्यवाही पर 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं। यानी एक घंटे का खर्च लगभग 1.5 करोड़ रुपये बैठता है। इससे लोकसभा में कार्यवाही न चलने से 126 करोड़ रुपये और राज्यसभा में करीब 122 करोड़ बर्बाद हुए। हालांकि, अंतिम नौ कार्य दिवसों में ताबड़तोड़ विधायी कामकाज निपटाए गए। राज्यसभा में 15 तो लोकसभा में 12 विधेयक पारित किए गए। 
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बिना चर्चा पारित हुए सभी विधेयक
सत्र के अंतिम दो सप्ताह में सरकार विधायी कामकाज निपटाने के मामले में हड़बड़ी में दिखी। दोनों सदनों में 27 विधेयक पारित हुए। हालांकि, विपक्ष के हंगामे के बीच सभी विधेयक या तो बिना किसी चर्चा के या चर्चा की औपचारिकता निभाकर ध्वनिमत से पारित कराए गए। देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर विशेष चर्चा में भी विपक्ष ने हिस्सा नहीं लिया और यह चर्चा अधूरी रही।

हंगामे की भेंट चढ़ा पूरा सत्र...
सत्र की शुरुआत ऑपरेशन सिंदूर पर हंगामे और पहले ही दिन उपराष्ट्रपति धनखड़ के इस्तीफे से हुई। जस्टिस वर्मा के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव शुरू करने की कोशिश पर विवाद के बाद धनखड़ के नाटकीय इस्तीफे को विपक्ष ने मुद्दा बनाया। विपक्ष अंतिम दिन तक एसआईआर पर चर्चा की मांग पर अड़ा रहा। इस कारण दोनों सदनों की कार्यवाही लगातार बाधित रही।

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महाभियोग का रास्ता हुआ साफ
बड़ी मात्रा में जली नकदी बरामदगी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू करने पर सहमति बनी। इस संदर्भ में सभी पक्षों की ओर से दिए गए नोटिस को स्वीकार करते हुए स्पीकर ने नियमानुसार तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया।
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मनी गेमिंग समेत कई विधेयक पास
  • हंगामे के बावजूद सरकार विधायी कामकाज निपटाने में सफल रही  
  • प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री व राज्यों के मंत्रियों को संगीन अपराध में 30 दिनों की हिरासत या जेल के बाद पद से हटाने संबंधी तीन अहम विधेयक पेश किए गए, जिसे संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया।
  • ऑनलाइन गेमिंग की आड़ में सट्टेबाजी और जुए को दंडनीय अपराध बनाने वाले ऑनलाइन गेमिंग संवर्धन एवं विनियमन विधेयक पर संसद की मुहर लगी।
  • इस विधेयक में ई-स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने के साथ प्राधिकरण बनाने का प्रस्ताव है। राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ ही यह कानून बन जाएगा।
अब तक का सबसे अमर्यादित मानसून सत्र
  • 18वीं लोकसभा का पहला मानसून सत्र बृहस्पतिवार को खत्म हो गया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह लोकसभा के इतिहास के सबसे हंगामेदार व अमर्यादित सत्रों में से एक रहा। उत्पादकता व अनुशासन दोनों ही मामलों में अब तक का सबसे खराब साबित हुआ।
  • लोकसभा सचिवालय और पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पूरे सत्र में लोकसभा की उत्पादकता सिर्फ 16 फीसदी रही। कुल 208 घंटे की संभावित कार्यवाही में से करीब 175 घंटे शोर-शराबे और स्थगन में बर्बाद हो गए। यानी वास्तविक रूप से कामकाज सिर्फ 33 घंटे ही हो सका, जिसमें 18 घंटे ऑपरेशन सिंदूर पर बहस हुई।
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घटती जा रही उत्पादकता
  • 2010 : उत्पादकता 45% रही, जिसमें कुल 200 संभावित घंटे में से 110 घंटे हंगामे या अन्य कारणों से बर्बाद हुए।
  • 2012 : उत्पादकता 27% तक गिर गई और 160 घंटे बर्बाद हुए, जबकि 2015 में यह और घटकर 25% हो गई। और बर्बाद घंटे बढ़कर 170 हो गए।
  • 2019 : थोड़ी सुधार दिखी, उत्पादकता 35 फीसदी रही और 140 घंटे बर्बाद हुए।
  • 2021 : उत्पादकता सबसे कम 22 फीसदी दर्ज की गई और 165 घंटे बर्बाद हुए।
  • 2023 : स्थिति कुछ बेहतर हुई, उत्पादकता 30 फीसदी और बर्बाद घंटे 150 दर्ज हुए।
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