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संसद में एक ही सत्र में बिल पास कराने का चलन बढ़ा: 18वीं लोकसभा में 53% विधेयक पारित, बहस पर क्यों उठे सवाल?

Sat, 22 Aug 2026 05:49 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, नई दिल्ली।

सार

संसद में कानून बनाने की रफ्तार जितनी तेज हुई है, उतनी ही संसदीय चर्चा की जगह सिमटती दिख रही है। 18वीं लोकसभा के हालिया मानसून सत्र में 11 बिल महज कुछ मिनटों के भीतर बिना किसी खास बहस के पारित कर दिए गए। यह स्थिति जहां एक तरफ विधायी कामकाज की जल्दबाजी दर्शाती है, वहीं दूसरी तरफ यह सवाल भी खड़ा करती है कि बिना विस्तृत समीक्षा के बनने वाले कानूनों का देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा।

 

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18वीं लोकसभा - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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संसद में जिस सत्र में बिल पेश किया जाता है, उसी सत्र में उसे पास कराने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक, 18वीं लोकसभा में अब तक पेश किए गए 64 में से 34 यानी 53 फीसदी बिल दोनों सदनों से उसी सत्र में पारित हो चुके हैं।
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यह रुझान 16वीं लोकसभा से काफी अलग है। 16वीं लोकसभा के दौरान 189 बिल पेश हुए थे, जिनमें से सिर्फ 33 फीसदी यानी 63 बिल ही उसी सत्र में पास हुए थे। 17वीं लोकसभा में यह आंकड़ा दोगुना होकर लगभग 62 फीसदी यानी 190 में से 117 बिल पर पहुंच गया था।

2024 से 2026 के बीच बदलता घटनाक्रम
हालांकि, 18वीं लोकसभा की शुरुआत इस मामले में थोड़ी धीमी रही थी। साल 2024 के बजट सत्र और शीतकालीन सत्र में पेश हुआ एक भी बिल उसी सत्र में पास नहीं हो सका था। लेकिन 2025 से यह ट्रेंड पूरी तरह बदल गया। 2025 के बजट सत्र में पांच में से तीन, मानसून सत्र में 13 में से 8 और शीतकालीन सत्र में नौ में से सात बिल उसी सत्र में पारित किए गए।
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साल 2026 में यह तेजी और बढ़ गई। 2026 के बजट सत्र में पेश 10 में से पांच बिल उसी सत्र में पास हुए। इसके बाद 13 अगस्त 2026 को खत्म हुए मानसून सत्र में सबसे ज्यादा तेजी देखी गई। इस सत्र में पेश किए गए 12 में से 11 बिल संसद से पारित करा लिए गए। केवल 'भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2026' ही लंबित रहा।

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मानसून सत्र 2026 में दिखी सबसे ज्यादा तेजी
मानसून सत्र 2026 में सरकार के मूल एजेंडे में पांच नए और दो पुराने बिल शामिल थे। लेकिन पास हुए 11 बिलों में से छह ऐसे थे, जो मूल एजेंडे में सूचीबद्ध ही नहीं थे। वहीं, पुराने दो बिलों, विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025 और विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 में से एक भी पास नहीं हो सका। पहला बिल समिति के पास है और दूसरे को भारी विरोध के बाद संयुक्त समिति को भेज दिया गया।

पीआरएस का कहना है कि बिल पेश होने और पास होने के बीच कम समय मिलने से सांसदों को अध्ययन और हितधारकों से चर्चा का समय नहीं मिलता। मानसून सत्र में नौ बिल बिना किसी अन्य सांसद के बोले ही पास हो गए। वहीं सात बिलों को पास होने में पांच मिनट या उससे भी कम समय लगा।
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हंगामे के कारण इस मानसून सत्र में लोकसभा में सिर्फ 15 फीसदी और राज्यसभा में 33 फीसदी ही काम हो पाया। लोकसभा में प्रश्नकाल पूरे सत्र में महज नौ मिनट चला और 380 में से केवल दो मौखिक सवालों के जवाब दिए जा सके। संसद में बिना विस्तृत बहस के महज पांच मिनट में बिल पास होने का यह नया ट्रेंड देश के कानूनों और आम जनता पर क्या असर डालेगा, यह समझना बेहद जरूरी है।
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