मई 2016 में राजस्थान की युवती का विवाह अमेरिका में ग्रीनकार्ड पर काम कर रहे युवक से हुआ था। अमेरिका में ही 2017 में उनकी बेटी का जन्म हुआ। इससे बेटी को अमेरिका की नागरिकता मिल गई। इस बीच, पति-पत्नी के संबंध बिगड़ गए और युवती ने अमेरिका की जिला अदालत में केस दायर किया। कोर्ट ने दिसंबर 2018 तक युवक को पत्नी-बेटी का खर्च उठाने और बातचीत के जरिए बेटी की कस्टडी पर फैसला करने को कहा, लेकिन युवती सितंबर 2018 में ही बेटी को लेकर भारत आ गई। इस पर अमेरिकी कोर्ट ने बेटी की कस्टडी पिता को सौंपते हुए युवती के खिलाफ वारंट किया।
कोर्ट ने दिया एक हफ्ते का समय
युवती : मैं अमेरिकी कोर्ट का आदेश समझ नहीं पाई। भाषायी दिक्कतों की वजह वह अमेरिकी वकील से बात नहीं पाई।
सुप्रीम कोर्ट : आप अमेरिका में बड़े रिटेल स्टोर में काम कर चुकी हैं, पति के खिलाफ शिकायत की, केस किया। भाषायी दिक्कत का तर्क सही नहीं।
पति (हलफनामे में) : मैं सुलह के लिए राजी हूं। इसके बावजूद अगर वह कानूनी कार्यवाही ही चाहती है, तो भी मैं उसके और बेटी के अमेरिका आने, रहने व अन्य खर्च उठाने को राजी हूं।
सुप्रीम कोर्ट : युवती एक हफ्ते में बताए कि क्या वह बेटी के साथ 20 फरवरी के पहले अमेरिका जाने पर राजी है। अगर वह अमेरिका नहीं जाना चाहती तो बेटी की कस्टडी पति को सौंपे। अमेरिका जाने के बाद पति रोज रात आठ बजे 15 मिनट के लिए वीडियोकॉल कर बेटी की बात मां से कराएगा। हर वर्ष दो बार बेटी को भारत लाएगा ताकि बेटी मां के साथ रह सके।