इमरान खान नियाजी पाकिस्तान में अपनी पहली सियासी पारी खेलने के लिए तैयार हैं। बाईस साल पहले उन्होंने क्रिकेट का बैट छोड़कर पहली बार वोट डाला था। उससे पहले चालीस साल की उम्र तक उन्होंने एक बार भी वोट नहीं डाला। वे इसलिए भी भाग्यशाली हैं कि पाकिस्तान लगातार तीन बार चुनाव के जरिए सत्ता बदलते देख रहा है और सेना ने ऐसा होने दिया है। अन्यथा उनसे चतुर और प्रतिभाशाली राजनेताओं को फौज ने बाहर का रास्ता दिखाया है। फौज ने तो इस बार भी सियासी समीकरण अपनी जाजम पर बैठकर तय किए हैं।
कह सकते हैं अब सेना सीधे सीधे शासन करने के बजाए अपने शासक तैयार करने की नीति पर चल रही है। वैसे तो जुल्फिकार अली भुट्टो, बेनजीर भुट्टो, आसिफ अली जरदारी और मियां नवाज शरीफ की प्राथमिक पाठशाला भी फौज के आंगन में ही थी, मगर जैसे ही वे ताकतवर हुए और उन्हें अपने इस्तेमाल किए जाने का अहसास हुआ, सेना ने हटा दिया। इमरान खान ने भी कुछ-कुछ इसी तरह शुरुआत की है। हनीमून कब तक चलेगा, देखना है।
लेकिन आज के इमरान खान की सबसे बड़ी लड़ाई अपने आप से है। जो उनकी अब तक की छवि है ,वही अब उनके आड़े आने वाली है। अब महिलाओं से रोमांस और प्लेबॉय की छवि से मुक्त होना होगा। हल्की फुल्की टिप्पणियों से विवादों को न्यौता देने वाले इमरान कभी फौजी शासन तो कभी जम्हूरियत की वकालत करते रहे हैं। अब उन्हें अपने विचारों की परिपक्व फसल उगानी पड़ेगी। अभी तक लोग उनको देखने के लिए आते थे। अब उनके काम को देखने की बारी है।
जीत के बाद इमरान खान ने अपनी कुछ प्राथमिकताओं का खुलासा किया है। उनकी जिंदगी का यह निर्णायक मोड़ है इसलिए अचानक मीडिया से मुखातिब होने पर प्राथमिकताएं भावुकता में गड्डमड्ड भी हुई होंगीं। यह सोचकर इसे बहुत व्यवस्थित रूप में नहीं देखना चाहिए। फिर भी उन्होंने कमजोर तबको, गरीबों, बच्चों और महिलाओं के बारे में जो विचार प्रकट किए हैं, वे एकबारगी संतोष का आधार देते हैं। मगर पाकिस्तान की असल चुनौतियां तो कुछ और ही हैं।
अपने संबोधन में उन्होंने भारत का जिक्र काफी देर से किया और भारतीय मीडिया से खिन्नता भी जताई। उन्हें इस बात से नाराजगी है कि भारत के पत्रकारों ने उनकी पारी के पीछे फौज का हाथ बताया है। हालांकि यह बात नवाज शरीफ और बिलावल भुट्टो की पार्टी तो पूरे प्रचार अभियान में कहती रही है। पहले भी ऐसे उदाहरण हैं, जब आईएसआई के प्रवक्ताओं ने साफ-साफ ऐलान किया है कि खुफिया फंड का इस्तेमाल उम्मीदवारों के समर्थन और विरोध में होता रहा है। इसलिए इमरान की यह खीझ तो बेमानी है। असल प्रसंग तो भारत से रिश्तों का है।
कश्मीर समस्या का समाधान इमरान बातचीत से चाहते हैं और संयुक्त राष्ट्र की बैसाखी भी नहीं छोड़ना चाहते। वे आतंकवाद को समर्थन देते हुए भारत की सर्जिकल स्ट्राइक का जवाब देने की बात भी करते हैं। उनकी प्रांतीय सरकार हक्कानी नेटवर्क को अमेरिका से मिली सहायता राशि में से तीस लाख डॉलर की मदद देती है। हक्कानी इसका उपयोग अफगानिस्तान में अमेरिका के खिलाफ करता है। इससे साफ है कि आतंकवादियों और कश्मीर को लेकर उनकी नीति पुरानी सरकारों या उनके मुखियाओं के दृष्टिकोण से अलग नहीं है।
इमरान खान कश्मीर में मानव अधिकारों के हनन और सेना के इस्तेमाल की बात करते हैं। वे भूल जाते हैं कि पाकिस्तान में बांग्लादेश बनने से पहले पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर कितने जुल्म ढाए गए। लाखों लोग मारे गए थे। अनगिनत युवतियों के साथ फौज ने दुष्कर्म किया और शहरी इलाकों में युद्ध के दौरान इस्तेमाल होने वाले हथियार और टैंक उतार दिए। इसके बाद बलूचिस्तान में कितनी बार जन आंदोलन कुचला गया। फौज ने वहां युद्ध जैसा लड़ा। टैंकों का उपयोग हुआ, हवाई बमबारी हुई, आंदोलन के नेताओं का कितनी निर्ममता से कत्ले आम हुआ, पूरी दुनिया जानती है। पख्तूनिस्तान में पठान आंदोलन कुचलने के लिए क्या-क्या नहीं किया गया?
पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगित बाल्टिस्तान में सेना के जुल्म अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी भूली नहीं है। जाहिर है आरोपों की अंताक्षरी से पाकिस्तान की पोल ही खुलने वाली है। कश्मीर समस्या के समाधान की ओर संवाद का रास्ता ही ले जाएगा। इमरान खान को यह ध्यान रखना होगा कि फौज कभी भी लोकतांत्रिक सुधारों को मजबूत नहीं होने देगी। मुल्क की भलाई के लिए उन्हें कूटनीतिक प्रयासों का सहारा लेना पड़ेगा।
क्या इस बात को पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री समझेंगे कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक स्थिरता जितनी उनके लिए जरूरी है ,उतनी ही जरूरी हिंदुस्तान के लिए भी है। भारत से नफरत के आधार पर जो भावना पाकिस्तान में पनपी है ,उसने इसे कभी एक देश का आकार लेने ही नहीं दिया। बांग्लादेश की फांस से तो पाकिस्तान को कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। बदले में उसने पंजाब और कश्मीर में अपने सारे प्रयास कर लिए। अब वहां हुक्मरानों को सचाई समझते हुए अवाम की भलाई तथा खुशहाली के लिए काम करना होगा।
आज पाकिस्तान दिवालिया होने के कगार पर है। चीन का शिकंजा दिनों दिन विकराल हो रहा है। इमरान को इस पर ध्यान केंद्रित करना होगा। भारत और पाकिस्तान की भलाई इसी में है कि पाकिस्तान में हमेशा प्रजातंत्र हरा भरा रहे।