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हकीकत: ऑक्सीजन उत्पादन पर्याप्त, लेकिन आपूर्ति व्यवस्था में कई खामियां

Tue, 27 Apr 2021 07:25 AM IST
Jeet Kumar अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली

सार

2019, यानी महामारी के पहले भारत को सलाना 750 से 800 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत थी। दूसरी लहर आने के बाद 12 अप्रैल को मांग 3,842 मीट्रिक टन हो गई। 10 दिन बाद यानी 22 अप्रैल को यह जरूरत 6,785 मीट्रिक तक जा चुकी थी।
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ऑक्सीजन की देश में इतनी कमी क्यों? - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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महामारी की दूसरी लहर भारत में न केवल प्राणघातक रही है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े स्तर पर मौजूद खामियां और कमियां भी सामने आ रही हैं। सबसे बड़ी कमी तरल मेडीकल ऑक्सीजन (एलएमओ) की हो  रही है। 

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पर ऐसा, क्यों हो रहा है, हालात क्यों बिगड़ रहे हैं? इसे समझने के लिए देश में तरल ऑक्सीजन के उत्पादन और उसे मरीज तक पहुंचाने की व्यवस्था को समझना होगा। इन्हें समय रहते दूर करके हजारों लोगों का जीवन बचाया जा सकता था, पर सरकार ने कदम उठाने में देर कर दी।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार हाल तक भारत सालाना 7,127 मीट्रिक टन तरल ऑक्सीजन का उत्पादन कर रहा था। यह सामान्य समय में चिकित्सा व औद्योगिक दोनों उपयोग के लिए काफी था। महामारी ने चिकित्सा उपयोग में मांग चार गुना से भी ज्यादा कर दी। 
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मिसाल के लिए 2019, यानी महामारी के पहले भारत को सलाना 750 से 800 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत थी। दूसरी लहर आने के बाद 12 अप्रैल को मांग 3,842 मीट्रिक टन हो गई। 10 दिन बाद यानी 22 अप्रैल को यह जरूरत 6,785 मीट्रिक तक जा चुकी थी।

इसलिए पड़ती है रोगी को ऑक्सीजन की जरूरत
पृथ्वी के वातावरण में 21 फीसदी ऑक्सीजन है। हमारे फेफड़े सांस के जरिए भीतर दाखिल हवा से ऑक्सीजन फिल्टर करते हैं। लेकिन कोविड 19 की चपेट में आए रोगी के फेफड़े में ऑक्सीजन को ग्रहण की क्षमता घटने लगती है, ऐसे में उसे 21 फीसदी के बजाय ज्यादा ऑक्सीजन की मात्रा वाली हवा की जरूरत होती है। यही नहीं यह तरल ऑक्सीजन सप्लाई काम आती है।

कैसे बनती है ऑक्सीजन?
हमारे वातावरण में काफी ऑक्सीजन है, लेकिन आपको बताते हैं कि आखिर सिलेंडर के अंदर ऑक्सीजन कहां से आती है। यहां आपको बता दें कि गैस क्रायोजेनिक डिस्टिलेशन प्रोसेस के जरिए ऑक्सीजन बनती है। इस प्रक्रिया में हवा को फिल्टर किया जाता है, ऐसा करने से धूल-मिट्टी इससे अलग हो जाती है। इसके बाद कई चरणों में हवा को कंप्रेस यानी उस पर भारी दबाव डाला जाता है।

इसके बाद कंप्रेस हो चुकी हवा को मॉलीक्यूलर छलनी एडजॉर्बर से ट्रीट किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि पानी के कण, कार्बनडाईऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन इससे अलग हो सके। वहीं, जब ये प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो इसके बाद कंप्रेस हो चुकी हवा डिस्टिलेशन कॉलम में जाती है।

यहां पहले इसे ठंडा ( ये सब प्लेट फिन हीट एक्सचेंजर और विस्तार टरबाइन प्रक्रिया के जरिए होता है) और उसके बाद 185 डिग्री सेंटीग्रेट पर इसे गर्म किया जाता है, जिससे इसे डिस्टिल्ड किया जाता है।

यहां आपको बता दें कि डिस्टिल्ड एक प्रक्रिया है, जिसमें पानी को उबाला जाता है और उसकी भाप को कंडेंस करके जमा किया जाता है। इस प्रक्रिया को कई बार अलग-अलग स्टेज पर किया जाता है। इसमें ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और आर्गन जैसी गैसें अलग-अलग हो जाती हैं। इस प्रक्रिया के बाद ही लिक्विड ऑक्सीजन और गैस ऑक्सीजन मिलती है।

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