बच्चों के लबों पर मुस्कान लाना चाहती है पिंकी
जिसे कभी होठकटिया कह कर चिढ़ाया जाता था और जिसकी मुस्कान ने हालीवुड के ग्लैमर की दुनिया को चौंका दिया, स्माइल पिंकी नामक डाक्यूमेंट्री फिल्म की असल किरदार पिंकी डॉक्टर बनकर अपने जैसे बच्चों के लबों पर मुस्कान लाना चाहती है। जिला मुख्यालय से करीब 55 किलोमीटर दूर रामपुर ढबहीं गांव छोटी खेरिया की पिंकी सोनकर डॉक्टर बनने के सपने बुन रही है। 14 साल की पिंकी कक्षा चार में पढ़ रही है।
2008 में मेगन माइलन ने कटे होठ और तालू वाले बच्चों के इलाज पर आधारित 39 मिनट की डाक्यूमेंट्री फिल्म स्माइल पिंकी बनाई तो उन्होंने नहीं सोचा था कि जिस पिंकी को उन्होंने दुर्गम स्थल से चुना था, आस्कर के रेड कार्पेट पर दुनिया का ध्यान खींचेगी। हिंदी और भोजपुरी भाषा में बनी स्माइल पिंकी को छोटे विषय पर बेस्ट डाक्यूमेंट्री का 81वां एकेडमी अवार्ड मिला था।
इसके लिए आयोजित समारोह में पिंकी भी शामिल हुई थी। देश लौटने पर पिंकी के लिए सबने पलक पांवडे़ बिछा दिए थे। प्रशासन ने उसके पिता राजेंद्र सोनकर को आर्थिक मदद दी और उनके नाम जमीन का पट्टा कर दिया। गांव तक सड़क बनाने का एलान भी हो गया। 2013 में विंबलडन के मेंस सिंगल के फाइनल का टॉस करने के लिए पिंकी को लंदन बुलाया गया।
पिंकी के ग्लैमर का दौर बीत गया
पिंकी का पसंदीदा विषय है अंग्रेजी
इसके बाद पिंकी के ग्लैमर का दौर बीत गया। वह एक बार फिर गांव में बकरियां चराने लगी। उसके पिता दूसरों के बाग की रखवाली करके बमुश्किल परिवार चला पाते थे। इसी बीच तत्कालीन एसडीएमक प्रयास पर चुनार के द रेडिएंट इंटरनेशनल स्कूल ने पिंकी के सारे खर्चे और पढ़ाई का जिम्मा उठाया। यहां तीन साल की पढ़ाई के बाद अब पिंकी आत्मविश्वास से भर गई है।
हिंदी पढ़ने में भी अटकने वाली पिंकी का पसंदीदा विषय अंग्रेजी हो गया है। पिंकी बताती है कि लंदन जाने से पहले उसे अंग्रेजी के कुछ शब्द - हैलो, हाऊ आर यू, आई एम फाइन...सिखाए गए थे। यहीं से उसके मन में पढ़ने की इच्छा जगी। चार भाई-बहनों में दूसरे नंबर की पिंकी कहती है कि डॉक्टर बनकर परेशान लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाऊंगी। आखिर मैं स्माइल पिंकी के नाम से जानी जाती हूं।
गांव में बिजली-पानी तक नहीं
पिंकी के गांव में न अब तक न तो बिजली पहुंची है और न ही वहां पेयजल की सुविधा है। पिंकी की मां शिमला देवी और बाप राजेंद्र प्रसाद सोनकर आम के बगीचे की रखवाली करते हैं। डाक्यूमेंट्री के लिए किरदार की तलाश के दौरान मेगन माइलन को पिंकी यहीं मिली थी। एक एनजीओ के माध्यम से वाराणसी के एक निजी चिकित्सालय में आपरेशन के दौरान डाक्यूमेंट्री फिल्म स्माइल पिंकी बनी, जिसे वर्ष 2009 में आस्कर से नवाजा गया।
जब पिंकी का एडमिशन लिया गया, उसे हिंदी भी नहीं आती थी। अब उसमें जबरदस्त बदलाव हुआ है। डांस व सिंगिंग में उसकी रुचि है। उसे हॉस्टल, यूनिफार्म, शूज, ड्रेस, भोजन व किताबें नि:शुल्क दी जाती हैं।
- रेनू वार्ष्णेय, डायरेक्टर, द रेडिएंट इंटरनेशनल स्कूल, चुनार (मिर्जापुर)