नोट बंदी के फैसले के खिलाफ एकजुट विपक्ष ने बुधवार को सरकार के खिलाफ सड़क से संसद तक मोर्चा खोला। बीजेडी और टीआरएस को छोड़ कर अन्य विपक्षी दलों के 200 से अधिक सांसदों ने पहले संसद भवन परिसर में विरोध प्रदर्शन किया तो बाद में संसद की कार्यवाही ठप कर दी। इस मुद्दे पर सरकार की सियासी घेराबंदी में जुटे विपक्ष ने 28 मार्च को देश भर में विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की है।
उधर अपने पुराने रुख पर अडिग सरकार ने दो टूक शब्दों में विपक्ष के सामने घुटने न टेकने का ऐलान कर दिया है। सरकार ने विपक्ष की नोट बंदी के फैसले के कथित रूप से लीक होने के आरोपों की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने और लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव के तहत चर्चा कराने की मांग को सिरे से ठुकरा दिया है।
नोट बंदी के फैसले ने वर्ष 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद पहली बार विपक्ष को एकजुट होने का मौका दे दिया है। अब तक इस फैसले के खिलाफ सरकार पर अलग-अलग हमला बोलने वाले विपक्ष ने बुधवार को सड़क और संसद में एकजुट हो कर हमला बोला। संसद की कार्यवाही शुरू होने से पूर्व विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन कर सरकार पर आर्थिक अराजकता फैलाने का आरोप लगाया।
विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस, सपा, बसपा, वाम दल, डीएमके, एआईएडीएमके, जदयू, राजद, इनेलो सहित कई अन्य दलों के सांसदों ने हिस्सा लिया। विरोध प्रदर्शन के बाद विपक्ष ने राज्यसभा में नोट बंदी के फैसले के लीक होने की जांच जेपीसी से कराने, प्रधानमंत्री को राज्यसभा में आ कर जवाब देने तो लोकसभा में मत विभाजन वाले नियम के तहत चर्चा कराने की मांग करते हुए जम कर हंगामा किया। इस कारण संसद की कार्यवाही लगातार 8वें दिन भी ठप रही।
विपक्ष एकजुटता में सियासी लाभ देख रही है सरकार
अपने सख्त रुख के कारण विपक्ष को एक होने का मौका देने के बावजूद सरकार इसमें सियासी लाभ देख रही है। सरकार का कहना है कि इस फैसले को जनता का व्यापक समर्थन हासिल होने के कारण विरोध करने वाले के खिलाफ गलत धारणा बन रही है। सियासी संदेश जा रहा है कि विपक्ष काला धन के खिलाफ छेड़े गए अभियान के खिलाफ है। ऐसे में विपक्ष जितना एजुट होगा, सरकार को उतना ही ज्यादा सियासी लाभ होगा। यही कारण है कि चर्चा के सवाल पर सरकार अपना रुख नरम करने के लिए तैयार नहीं है।