ओम प्रकाश रावत भारत के 22वें चुनाव आयुक्त के पद से शनिवार को सेवानिवृत्त हो गए हैं। उन्होंने इसी साल जनवरी में चुनाव आयुक्त का पदभार संभाला था। उनका कार्यकाल काफी व्यस्त रहा क्योंकि एक साल से कम समय के अंदर 9 राज्यों में चुनाव हुए/होने वाले हैं। उनका कार्यकाल विवादों से भरा हुआ भी रहा। उनपर अक्तूबर में पांच राज्यों में होने वाले चुनावों की तारीखों का ऐलान करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस में देरी करने से लेकर दिल्ली के मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट हटाने तक के आरोप लगे हैं। 1997 बैच के मध्यप्रदेश कैडर के आईएस अधिकारी रावत ने रविवार को सुनील अरोड़ा को पदभार सौंपा है।
इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में उन्होंने नोटबंदी से लेकर अपनी उपलब्धियों तक पर बात की। जब उनसे पूछा गया कि आपने चुनाव आयुक्त के तौर पर एक साल तक का कार्यकाल संभाला। आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही और आपको क्या अफसोस है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड, कर्नाटक में चुनाव हुए।
अब तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम में चुनाव हो चुके हैं/ हो रहे हैं। मेरा संकल्प इन सभी राज्यों में स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव कराने का था। अभी तक सबकुछ ठीक रहा है। यहां तक कि छत्तीसगढ़ जो लेफ्ट विंग एक्ट्रीमिज्म से प्रभावित रहा है वहां रिकॉर्ड मतदान हुआ है। यह शांतिपूर्ण था और मतदाताओं के बीच काफी उत्साह रहा। यह काफी संतोषजनक रहा। कर्नाटक चुनाव के दौरान सीविजिल मोबाइल ऐप लांच की थी। इससे मतदाताओं को किसी भी तरह के चुनावी उल्लंघन की सूचना देने में मदद मिली।
जब उनसे पूछा गया कि आप चुनावों में पैसों की ताकत के बारे में बोलते रहे हैं। नोटबंदी को दो साल हो चुके हैं। क्या इसका कालेधन पर कोई प्रभाव पड़ा? इसके जवाब में ओपी रावत ने कहा बिलकुल नहीं। नोटबंदी के बाद हुए चुनावों में हमने रिकॉर्ड पैसों को जब्त किया है। यहां तक कि पांच राज्यों में हुए चुनाव में लगभग 200 करोड़ रुपये तक जब्त किए गए। इससे पता चलता है कि चुनाव के दौरान पैसे जिन स्रोतों से आ रहे हैं वह काफी प्रभावशाली हैं और उनपर इस तरह के कदमों से कोई फर्क नहीं पड़ता है।