इंजीनियरिंग के छात्रों की कैंपस से होने वाली प्लेसमेंट में पिछले पांच सालों के दौरान 40 प्रतिशत से बढ़कर 2017-18 के दौरान 42 प्रतिशत पर पहुंच गई है। इसकी वजह बहुत से कॉलेजों का बंद होना और कंपनियों द्वारा ज्यादा बच्चों को रोजगार देना है। क्योंकि देश के 58 प्रतिशत बच्चों को कैंपस से नौकरी नहीं मिली है। बेशक 42 प्रतिशत अतीत की तुलना में ज्यादा है।
अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के आंकड़ों के अनुसार 2016-17 के दौरान 38.39 और 2013-14 के दौरन 31.95 प्रतिशत बच्चों को नौकरी मिली थी। इसकी एक वजह
इंजीनियरिंग कॉलेजों का बंद होना और निचले पदों पर नामांकन होना है। 2017-18 और 2013-14 की तुलना में 9444,000 की बजाए 750,000 ही नामांकन हुए हैं। 2014-15 के दौरान इंजीनियरिंग के इंस्टीट्यूट में 2014-15 के दौरान 3,400 की कमी आई है। वर्तमान में भारत के 3,225 शीर्ष तकनीकी शिक्षा नियामक (एआईसीटीई) बच्चों को अंडरग्रैजुएट कोर्स ऑफर कर रहे हैं।
खराब नामांकन दर की वजह से बहुत से राज्यों ने एआईसीटीई से कहा था कि वह इंजीनियरिंग कॉलेजों में और सीटें ना बढ़ाए। इन राज्यों में हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, महाराष्ट्र और राजस्थान शामिल हैं। इन राज्यों ने एआईसीटीई के पास याचिका दायर की थी जिसके बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सूचित किया कि नए तकनीकी संस्थान ना बनाए जाएं। सरकार द्वारा
इंटर्नशिप को अनिवार्य बनाने की वजह से रोजगार की संख्या में इजाफा हुआ है। जिन लोगों को कंपनियों में सफलतापूर्वक इंटर्नशिप मिल जाती है उन्हें आराम से नौकरी भी मिल जाती है।