महाराष्ट्र की एक अदालत ने आतंक के आरोपों का सामने कर रहे तीन आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को सिर्फ "जिहाद" शब्द का इस्तेमाल करने की वजह से आतंकवादी घोषित नहीं किया जा सकता।
अकोला स्थित विशेष न्यायाधीश ए एस जाधव की अदालत ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए), शस्त्र अधिनियम और बॉम्बे पुलिस अधिनियम के तहत तीन आरोपियों के खिलाफ एक मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की है।
अब्दुल रज्जाक (24), शोएब खान (24) और सलीम मलिक (26) के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया, जिसमें 307 (हत्या का प्रयास) और 332 (लोक सेवक को अपने कर्तव्य करने से रोकने के लिए चोट पहुंचाना) शामिल हैं। राज्य में गोमांस प्रतिबंध को लेकर ईद उज जोहा के अवसर पर 25 सितंबर, 2015 को अकोला के पुसाद इलाके में एक मस्जिद के बाहर पुलिसकर्मियों पर हमला हुआ था। जिसके बाद इन तीनों को गिरफ्तार किया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, रज्जाक मस्जिद पहुंचा, एक चाकू निकाली और ड्यूटी पर मौजूद दो पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया और हमले से पहले कहा कि गोमांस पर प्रतिबंध की वजह से वह पुलिस को मार देगा।
आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने दावा किया कि आरोपी, मुस्लिम युवकों को आतंकवादी संगठनों में शामिल होने के लिए प्रभावित करने की एक साजिश का हिस्सा थे।
जाधव ने कहा, "ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपी रज्जाक ने गोहत्या पर प्रतिबंध के लिए सरकार और कुछ हिंदू संगठनों के खिलाफ हिंसा के जरिये अपने गुस्सा का इजहार किया।"
उन्होंने कहा, "इसमें कोई संदेह नहीं है कि उसने 'जिहाद' शब्द का इस्तेमाल किया था। लेकिन, इस निष्कर्ष पर पहुंचना तर्कसंगत नहीं कि केवल 'जिहाद' शब्द का इस्तेमाल करने के लिए उसे एक आतंकवादी घोषित किया जाना चाहिए।"
उन्होंने बताया, शब्दकोश के अनुसार, 'जिहाद' शब्द का शाब्दिक अर्थ "संघर्ष" है।
न्यायाधीश ने कहा, "जिहाद एक अरबी शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है उद्यम करना या संघर्ष करना... इसलिए केवल अभियुक्त द्वारा 'जिहाद' शब्द का इस्तेमाल उसे आतंकवादी घोषित करने के लिए उचित नहीं होगा।"