कांग्रेस के राहुल गांधी ने मंगलवार को दोहराया कि वह यह समझने के लिए भारत जोड़ो यात्रा पर निकले हैं कि ऐसा क्या था जो उन्हें पसंद था और ऐसा क्या था, जिसके लिए उन्होंने वर्षों तक दुर्व्यवहार सहा।
ऐसा क्या था पसंद...
भारत माता हर भारतीय की आवाज
राहुल गांधी ने कहा कि भारत माता हर एक भारतीय की आवाज है, चाहे वह कितना भी कमजोर या मजबूत क्यों न हो। उन्होंने स्वतंत्रता दिवस पर अपने 145 दिवसीय भारत जोड़ो यात्रा के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि मेरे प्रेम का उद्देश्य अचानक सामने आ गया था। मेरी प्यारी भारत माता कोई भूमि नहीं थी। यह विचारों का समूह नहीं था। यह कोई विशेष संस्कृति, इतिहास या धर्म नहीं था। भारत जोड़ो यात्रा हर एक भारतीय की आवाज थी, चाहे वह कितना भी कमजोर या मजबूत क्यों न हो। पिछले साल मैंने 145 दिन उस भूमि की पैदल यात्रा की थी, जिसे मैं अपना घर कहता हूं। इस दौरान रास्ते में कई लोगों ने मुझसे पूछा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? वे आज भी पूछते हैं, क्यों? आप क्या खोज रहे थे? आपको क्या मिला?
पुरानी चोट का दर्द वापस
उन्होंने आगे कहा कि वर्षों से मैं हर शाम आठ से दस किलोमीटर दौड़ता था। तो मैंने सोचा पच्चीस किलोमीटर मैं आसानी से चल सकता हूं। मुझे यकीन था कि चलना आसान होगा। कुछ ही दिनों में मुझे दर्द होने लगा। मेरे घुटने में लगी पुरानी चोट, जिसे फिजियोथेरेपी से दूर किया गया था, एक बार फिर से वापस आ गई थी।
उन्होंने कहा कि पुरानी चोट वापस आने पर अगली सुबह मैंने खुद को डरा हुआ पाया। मैंने सोचा आगे 3800 किलोमीटर की दूरी कैसे तय करूंगा? मेरा अंहकार वहीं खत्म हो गया। कुछ दिनों की यात्रा के बार फिजियो हमारे साथ थे। उन्होंने सलाह दी, लेकिन दर्द बना रहा।
लोगों से मिली ऊर्जा
कन्याकुमारी से कश्मीर भारत जोड़ो यात्रा का नेतृत्व करने वाले कांग्रेस नेता ने कहा कि जब भी वह रुकने के बारे में सोचते, कोई न कोई आता और उन्हें जारी रखने की ऊर्जा उपहार में दे जाता। उन्होंने कहा कि एक बार एक सुंदर पत्र लेकर आई एक प्यारी सी बच्ची, दूसरी बार कुछ केले के चिप्स के साथ एक बूढ़ी औरत, फिर एक आदमी जो अचानक दौड़कर मेरे पास आया और मुझे गले लगा लिया। उन्होंने कहा कि जब मुझे वास्तव में इसकी जरूरत थी तब यह एक छुपी हुई ऊर्जा मेरी मदद करती रही।
उन्होंने कहा कि फिर एक दिन, मुझे एक ऐसा सन्नाटा महसूस हुआ जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था। मैं उस व्यक्ति की आवाज के अलावा कुछ नहीं सुन सकता था जो मेरा हाथ पकड़कर मुझसे बात कर रहा था। वह आंतरिक आवाज जो मुझसे तब से बात करती थी जब मैं छोटा बच्चा था, वह चली गई थी, ऐसा लगा जैसे कुछ मर गया हो।
यात्रा के दौरान अपने अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि यह कितना आसान हो गया था। मैं नदी में उस चीज की तलाश कर रहा था जो केवल समुद्र में ही मिल सकती थी। उन्होंने एक कविता की पंक्तियां कहीं। कहा- अगर शब्द दिल से आते हैं तो वे दिल में प्रवेश करेंगे।