जमीन को कब्जे से मुक्त कराने पर मिली शाबाशी
- फोटो : ब्यूरो/ अमर उजाला, मथुरा
मथुरा के जवाहर बाग को कब्जा मुक्त कराने के दौरान पुलिस के दो अधिकारी शहीद हो गए। एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और एसओ फरह संतोष यादव ने बड़ा बलिदान दिया है। जिस फर्ज के लिए दोनों अधिकारियों ने शहादत दी वह फर्ज भी कोई छोटा नहीं है। शासन में बैठे उच्चाधिकारी अरबों की कीमत वाली करीब 300 एकड़ सरकारी जमीन को नक्सली मानसिकता वाले लोगों से छुड़ा लेने को किसी ‘गुड वर्क’ से कम नहीं मान रहे हैं। वहीं चर्चित नीली डायरी की फारेंसिक जांच भी हो सकती है। वह मुख्य आरोपी रामवृक्ष यादव की है इसमें अभी संदेह है।
शासन के एक प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी का कहना था कि किससे कहां चूक यह तो जो भी अधिकारी कर रहा है वह अपनी रिपोर्ट में देंगे, लेकिन नक्सलवादियों (कथित सत्याग्रही) ने जिस तरह से पुलिस के खिलाफ अपनी मोर्चा बंदी कर रखी थी। जिन हथियारों का इस्तेमाल किया गया उसका मुकाबला करते हुए 300 एकड़ जमीन को कब्जा मुक्त कराकर उनको खदेड़ देना शाबाशी का काम है।
इन अधिकारी का कहना था कि जिन दो परिवारों के वीर शहीद हुए हैं उन परिवारों का दुख -दर्द समझा जा सकता है। लेकिन जो जिस पेशे में होता है उस पेशे का जोखिम उठाते हुए ड्यूटी पूरी करना ही देश धर्म है। घटना स्थल का मौका मुआयना करने वाले अधिकारियों में शामिल यह अधिकारी हिचकते हुए कहते हैं कि सत्याग्रहियों के वेश में छिपे नक्सलियों का निशाना पुलिस थी।
एसपी सिटी और थानेदार पर जब हमला हुआ उस समय वहां कोई अन्य पुलिस कर्मी होता तो वह भी शिकार होता। सूत्रों का यह भी कहना है कि शासन को इस बात का एहसास है कि आमने-सामने की मुठभेड़ में एसपी सिटी और एसओ फरह नक्सलियों का निशाना बन रहे थे उस समय पुलिस कर्मी उनको छोड़कर भाग खड़े हुए थे। घटना और उसकी जांच से जुडे़ सभी अधिकारी इस तथ्य को स्वीकार तो कर रहे हैं लेकिन आफ द रिकार्ड।