भारतीय विदेश मंत्रालय ने डोभाल और वांग की करीब दो घंटे चली बातचीत को लेकर एक बयान भी जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि एनएसए डोभाल और चीनी विदेश मंत्री ने भारत-चीन सीमा क्षेत्र के पश्चिमी सेक्टर में हाल ही में हुई गतिविधियों पर निर्भीकता से स्वतंत्र विचार रखे। बयान के अनुसार, दोनों जल्द से जल्द एलएसी और भारत-चीन सीमा के अन्य क्षेत्रों पर फिर से शांति स्थापित करने के लिए सैनिकों की संख्या घटाना अहम है।
इस महत्वपूर्ण बैठक का पहला असर बैठक के एक दिन बाद ही दिख गया। अधिकारियों का कहना है कि चीन की सैना उस स्थान से करीब एक किलोमीटर पीछे हट गई है, जहां 15 जून की रात दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक टकराव हुआ था। इस झड़प में दोनों पक्षों को नुकसान हुआ था। भारत की ओर से जहां 20 सैनिक शहीद हुए थे वहीं, चीन ने अभी तक इससे संबंधित कोई जानकारी साझा नहीं की है।
सूत्रों के मुताबिक वीडियो कॉल के दौरान एनएसए डोभाल ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि दोनों पक्षों को अपने शीर्ष नेताओं से मार्गदर्शन लेना चाहिए कि भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में शांति स्थापित करना और उसे बनाए रखना दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के आगे विकास के लिए बहुत आवश्यक है। दोनों पक्षों को इस तरह के मतभेदों की अनुमति नहीं देनी चाहिए, जिसने विवाद की कोई स्थिति उत्पन्न हो सके।
डोभाल ने जोर देकर कहा कि दोनों पक्षों को भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में चरणबद्ध व्यवहार सुनिश्चित करना चाहिए। उन्होंने फिर कहा कि दोनों देशों को एलएसी का सम्मान और नियम से निरीक्षण करना चाहिए। यथास्थिति में बदलाव लाने के लिए एकपक्षीय कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। भविष्य में ऐसी किसी भी घटना से बचने के लिए जो सीमा पर शांति के लिए ठीक नहीं है, दोनों पक्षों को मिलकर काम करना चाहिए।
सूत्रों ने बताया कि चीन की ओर से सैनिकों को कम करने की प्रक्रिया पर भारत पूरी नजर रखेगा। ऐसा 15 जून को गलवां क्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प को देखते हुए किया जाएगा। यह झड़प इसलिए हुई थी क्योंकि चीन ने दोनों देशों के बीच छह जून को हुई सहमति को मानने से इनकार कर दिया था और अपने सैनिक पीछे नहीं हटाए थे।
सूत्रों का कहना है कि इस बार भारत कोई जोखिम लेने के लिए तैयार नहीं है। बता दें कि छह जून को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की पहले दौर की वार्ता छह जून को हुई थी। इसमें दोनों पक्षों ने गतिरोध वाले सभी स्थानों से धीरे-धीरे पीछे हटने के लिए समझौते को अंतिम रूप दिया था जिसकी शुरुआत गलवां घाटी से होनी थी, लेकिन झड़प ने तनाव बढ़ा दिया था।