गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में पिछले दिनों आक्सीजन की कमी के चलते दर्जनों बच्चों की मौत समेत आए दिन सही समय पर इलाज न मिल पाने के कारण बीमारियों से बेबस लील होती जिंदगी के चलते अब स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार के दायरे में लाने की मांग जोर पकड़ रही है।
क्योंकि देशभर के 47 सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखित याचिका में इसे लागू करने की मांग रखी है। खास बात यह है कि इन सांसदों में अधिकतर सांसद ऐसे हैं, जोकि स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय की समिति समेत कई अन्य संसदीय समिति के सदस्य भी हैं।
केंद्रीय सरकार कर्मचारी कल्याण परिषद के संयुक्त सचिव अजय कुमार ने एक साल पहले स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार के दायरे में लाने की मुहिम शुरू की थी, जिन्हें अब 47 सांसदों का साथ मिल गया है।
अमर उजाला के पास इन सभी सांसदों की लिखित याचिका के दस्तावेज उपलब्ध हैं। अजय समेत विभिन्न राजनैतिक दलों के सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजी अपनी लिखित याचिका में लिखा है कि शिक्षा की तरह स्वास्थ्य भी देश के लिए एक संवेदनशील विषय है।
सरकार की भी सबसे बड़ी चुनौती व उदेश्य है कि सभी को चिकित्सा सुविधा मुहैया करवायी जाए। लेकिन मौजूदा व्यवस्था में ये संभव नहीं दिख रहा है। स्वास्थ्य सेवा लेने के लिए कोई ठोस कानून न होने के चलते निजी अस्पताल के साथ-साथ सरकारी अस्पतालों में भी लोग इलाज नहीं करवा पाते हैं।
अत्यधिक भीड़ होने के चलते समय पर मरीज को इलाज की सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाती है। इसी के चलते कई बार मरीज की जान तक चली जाती है। यहां तक की चिकित्सक व अस्पताल प्रशासन इलाज करने से मना भी कर देते हैं।
इन सबका खामियाजा गरीब मरीज को भुगतना पड़ता है। अस्पतालों के इस गैर जिम्मेदाराना व्यवहार को देखते हुए एक मजबूत कानून बनाकर स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार में शामिल किया जाना चाहिए।
याचिका भेजने वालों में यूपी सलेमपुर के लोकसभा सांसद रविन्दर कुशवाहा, मोतीलाल वोहरा, राज्यसभा सांसद जुगुल किशोर, अश्विनी कुमार चौबे (स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य ),डॉ. प्रसन्न कुमार पाटसाणी (स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य और एम्स भुवनेश्वर की गवर्नमेंट बॉडी के सदस्य),राम चरित्र निषाद (मछलीशहर विधानसभा क्षेत्र -जौनपुर, यूपी ),रामविचार नेताम सांसद राज्यसभा(राष्ट्रीय सचिव भाजपा),हरिनरायन राजभर (सांसद लोकसभा घोसी-यूपी),शिव प्रताप शुक्ल (राज्यसभा सांसद,यूपी) व चिराग पासवान (स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के समिति) के नाम मुख्य हैं।
शिक्षा की तरह स्वास्थ्य सुविधा देना होगा जरूरी
''सरकार यदि इस अधिकार को लागू करती है तो फिर कोई भी अस्पताल मरीज को इलाज देने में आनाकानी के साथ देरी नहीं करेगा। क्योंकि मरीज के पास अधिकार होगा कि वह मना करने वालों पर कानूनी कार्रवाई करवा सके। जिस प्रकार शिक्षा का अधिकार कानून के चलते 14 साल तक शिक्षा देना बच्चों को अनिवार्य है, उसी प्रकार स्वास्थ्य सुविधा देना इसके तहत जरूरी हो जाएगा। सरकारी के साथ निजी अस्पताल भी इलाज में कोताही नहीं कर पाएंगे।'' - अजय कुमार, सचिव, केंद्रीय सरकार कर्मचारी कल्याण परिषद।