न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में सदस्यता पाने के लिए जी-तोड़ मेहनत से लगे भारत के लिए राहत ये है कि समूह का अहम सदस्य न्यूजीलैंड समर्थन में आया है, लेकिन तुर्की के मिजाज से लगता है कि एनएसजी में एंट्री अतर्राष्ट्रीय सियासत के अखाड़े में तब्दील होने वाली है। वजह है तुर्की का पाकिस्तान के समर्थन में आना। और इसकी सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है न्यूक्लियर एनपीटी यानी परमाणु अप्रसार संधि पर भारत के दस्तखत न होना।
दरअसल, हाल ही में प्रधानमंत्री के विदेश दौरे के दौरान समूह के सदस्य स्विट्जरलैंड और मैक्सिको ने भारत का समर्थन करने की हामी भरी तो पाकिस्तान भारत की इस सफलता पर बौखला गया। पाक सरकार के सलाहकार सरताज अजीज ने एनएसजी देशों को फोन घुमा डाला कि अगर मानदंडों के आधार पर एनएसजी में सदस्यता के लिए विचार किया जाए तो पाकिस्तान का पलड़ा भारत से भारी रहेगा।
सरताज ने एनपीटी पर भारत के दस्तखत नहीं होने की दुहाई दी थी और साल 1974 में इंदिरा शासन के दौर किए गए परमाणु परीक्षण का राग भी अलापा था।
ये बात भी काबिल-ए-गौर है कि भारत के उस परमाणु परीक्षण को देखते हुए ही न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप का गठन हुआ था। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या एनएसजी में भारत की सदस्यता को इन बातों से चुनौती मिलेगी? क्या पाकिस्तान और पाक समर्थित चीन या तुर्की जैसे अन्य देश इन बातों के बहाने भारत को एनएसजी में शामिल नहीं होने देंगे?
भारत की सदस्यता पर मुहर लगेगी, या पाक के बहाने मामला लटकेगा?
लेकिन भारत के लिए राहत की बात ये भी है कि दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका भारत का डटकर समर्थन कर रहा है। अमेरिकी सरकार के राजनयिक और सचिव जॉन कैरी समूह के सभी देशों को पत्र लिख चुके हैं कि भारत की सदस्यता को लेकर विचार किया जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी समर्थन की अहमियत दुनिया जानती है, इसलिए इस बार भारत की उम्मीदें बरकरार हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति और कूटनीति से भी दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष उनके मुरीद हो रहे हैं और उन्हें हर लिहाज से समर्थन का वादा कर रहे हैं। इस बात से भी भारत की दावेदारी में मजबूती लगती है। वहीं पाकिस्तान में पनप रहे आतंकवाद पर दुनिया का ध्यान तो पहले था ही और अमेरिका ने भी उसे खुले तौर चेतावनी दी है, साथ ही जैसे-जैसे मोदी ओबामा की दोस्ती में गहराती जा रही है, पाक से अमेरिका के रिश्तों में दूरियां साफ देखी जा सकती हैं।
भारत के पक्ष में खुलकर पैरवी और समर्थन की बात करने वालों देशों की फेहरिस्त में न्यूजीलैंड शामिल हो गया है तो अब भी तुर्की के अलावा ऑस्ट्रिया, आयरलैंड और दक्षिण अफ्रीका विरोध में हैं।
बीते हफ्ते वियना में एनएसजी के आवेदनों पर विचार करने के लिए हुई बैठक में इस बात के साफ संकेत मिल गए हैं कि भारत-पाक का मामला अंतर्राष्ट्रीय सियासत का अखाड़ा बनना तय है। अब देखना ये है कि भारत की सदस्यता पर मुहर लगेगी या फिर पाक के बहाने मामला अधर में लटकेगा।