मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के मतदान के बाद जीत का ऊंट किस करवट बैठेगा इस पर भाजपा और कांग्रेस के रणनीतिकारण कई सवालों का हल ढूंढने में लगे हैं। दोनों दलों के रणनीतिकार ठीक चुनावी मौकेपर बनी सामान्य, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक कल्याण समाज (सपाक्स) पार्टी के प्रदर्शन, किसानों की नाराजगी से उपजी नई सियासी परिस्थिति और बीते चुनाव की तरह इस चुनाव में भी मतदान में आए ढाई फीसदी उछाल का आकलन कर रहे हैं। दोनों ही दल चुनाव के दौरान बनी परिस्थितियों को अपने पक्ष में बता रहे हैं।
बढ़े मतदान का अपने अपने हिसाब से आकलन कर रहे दोनों दल
bjp-cong
जहां तक भाजपा का सवाल है तो इसके रणनीतिकार किसानों और अगड़ों में नाराजगी की बात स्वीकार करते हैं। हालांकि इनका दावा है कि पार्टी से अगड़ों का जो वर्ग पार्टी से नाराज हुआ, उसने विकल्प के तौर पर कांग्रेस की जगह अपाक्स को अपनाया। अगड़ों के एक तबके की नाराजगी का भाजपा को अपने पक्ष में एससी-एसटी मतदाताओं की गोलबंदी की उम्मीद बंधी है।
रणनीतिकारों का तर्क है कि करीब 39 फीसदी एससी-एसटी मतदाताओं ने देखा कि केंद्र की मोदी सरकार ने एसएस-एसटी एक्ट को इसकेमूल स्वरूप में वापस लाने के लिए संविधान संशोधन से भी पीछे नहीं हटी। इस कारण यह बड़ा वर्ग पार्टी के पक्ष में गोलबंद हुआ।
रणनीतिकार मतदान में ढाई फीसदी की बढ़ोत्तरी को एससी-एसटी वर्ग और परपंरागत मतदाताओं के आक्रामक मतदान का परिणाम मानते हैं। साथ ही यही याद दिलाते हैं कि बीते चुनाव में मतदान में ढाई फीसदी उछाल का भाजपा को बंपर लाभ हुआ है।
मतदान के बाद कई सवालों का हल ढूंढने में जुटे रहे दिग्गज
दिग्विजय सिंह
भाजपा के उलट इन मुद्दों पर कांग्रेस के रणनीतिकारों का अपना तर्क है। रणनीतिकार मानते हैं कि मतदान में उछाल दरअसल अगड़ों और किसानों की राज्य सरकार के खिलाफ जबर्दस्त नाराजगी के कारण आया। इनका यह भी कहना है कि हमेशा सियासी चतुराई दिखाते हुए रणनीतिगत मतदान करने वाले अगड़े इस बार राज्य के साथ केंद्र सरकार को सबक सिखाने के मूड में थे।
ऐसे में यह वर्ग एक नामालूम से पार्टी सपाक्स को वोट देने के बदले विकल्प के रूप में कांग्रेस को चुना है। पार्टी को उम्मीद है कि नाराज अगड़े और किसानों के बड़े तबके के साथ पार्टी को दस फीसदी आबादी वाले अल्पसंख्यकों को एकमुश्त वोट मिला है। ऐसे में पार्टी का सूबे में बीते डेढ़ दशक से जीत का सूखा खत्म होने वाला है।