नोटबंदी के बाद से जहां हर व्यक्ति पैसे की किल्लत से जूझ रहा है, वहीं उद्योग जगत की हालत भी लगातार पतली होती जा रही है। नोटबंदी के बाद उद्यमियों को इकाइयों की मौजूदा उत्पादन क्षमता को बरकरार रखने में पसीने छूट रहे हैं। नतीजतन विस्तार की तमाम योजनाओं को ग्रहण लग गया है। एक अनुमान के मुताबिक, औद्योगिक राजधानी लुधियाना के उद्योगों में दो हजार से लेकर पच्चीस सौ करोड़ रुपये तक की विस्तार प्रक्रिया पर ब्रेक लग गया है।
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उद्यमियों का साफ कहना है कि कम से कम छह माह बाद हालात की समीक्षा करके आगे की रणनीति तैयार की जाएगी। कुल मिलाकर उद्यमी मानते हैं कि वर्ष 2017 उद्योग जगत के लिए बेहतर साबित नहीं होगा।
आठ नवंबर को नोटबंदी के बाद से ही उद्योग जगत के तमाम समीकरण गड़बड़ा गए। हालत यह है कि उद्यमियों को रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए पैसे की जुगाड़ करने में भारी परेशानी हो रही है। लिहाजा औद्योगिक उत्पादन लगभग आधा रह गया है। उद्यमियों का कहना है कि 40 से 50 फीसदी तक लेबर वापस लौट गई है। ऐसे में नए निवेश के बारे में सोचना भी कठिन है।
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लुधियाना में बन रहे नए फूड पार्क में सालवान इंटरनेशनल को 12 करोड़ रुपये का निवेश करके फूड प्रोसेसिंग इकाई शुरू करनी थी। कंपनी के एमडी संदीप सालवान का मानना है कि नोटबंदी के बाद बैंक करेंसी के चक्कर में उलझ गए हैं। ऐसे में लोन संबंधी और अन्य बैंकिंग कामकाज पर फोकस कम हो गया है। दूसरे पेमेंट का फ्लो रुकने के कारण फिलहाल वेट एंड वॉच की नीति अपनाई गई है। हालात सामान्य होने के बाद ही इस पर आगे विचार किया जाएगा।
आगे के लिए टाल दी हैं निवेश योजनाएं
- फोटो : File Photo
अपैक्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के सचिव रजनीश आहूजा का कहना है कि औद्योगिक नगरी में होजरी, साइकिल, इंजीनियरिंग, फूड प्रोसेसिंग समेत तमाम तरह की इंडस्ट्री में सालाना दो से पच्चीस सौ करोड़ रुपये का निवेश होता है।
लेकिन नोटबंदी के बाद पासा एकदम से पलट गया है। उद्यमियों ने अपनी निवेश योजनाएं आगे टाल दी हैं। अब उद्यमियों के समक्ष मौजूदा उद्योगों को चलाने का ही संकट पैदा हो गया है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया है कि उद्योगों को जरूरत के मुताबिक करेंसी मुहैया कराने के पुख्ता प्रबंध किए जाएं।
स्थिति का आकलन कर रहे हैं उद्यमी
चैंबर ऑफ इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल अंडरटेकिंग्स के अध्यक्ष अवतार सिंह के मुताबिक, होजरी एवं इंजीनियरिंग उद्योग में विदेशों से बड़ी संख्या में मशीनरी आयात की जाती है। नोटबंदी के बाद आई किल्लत के चलते अधिकतर उद्यमियों ने अपने ऑर्डर तक कैंसिल कर दिए हैं।
दूसरे बैंकों में लोन के केसों की प्रोसेसिंग में भी अतिरिक्त वक्त लग रहा है। उद्यमियों का तर्क है कि अभी नए निवेश की कोई योजना नहीं है। फिलहाल स्थिति का आकलन किया जा रहा है।
लखनऊ। भारत में लेदर और इससे संबंधित उत्पादों के प्रमुख गढ़ों में लेदर कारोबार नोटबंदी के कारण बुरी तरह प्रभावित हुआ है। यह बात एसोचैम के ‘लेदर उद्योग पर नोटबंदी का प्रभाव’ पर सर्वे व विश्लेषण में कही गई। सर्वे के मुताबिक, जानवर की खाल की आपूर्ति में उल्लेखनीय गिरावट आई है।
चेन्नई में लेदर कारखानों में खाल की आपूर्ति में 60 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई, जबकि लेदर के अन्य प्रमुख गढ़ आगरा, कानपुर और कोलकाता में खाल की आपूर्ति में 75 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। कहा गया कि लेदर उद्योग इसलिए लड़खड़ा रहा है क्याेंकि कसाई, नकद भुगतान नहीं किए जाने की वजह से जानवरों की खाल उपलब्ध नहीं करा रहे हैं।
लेदर कारखाने परिवहन के माध्यम से खाल प्राप्ति में सक्षम नहीं हैं क्योंकि वे ड्राइवरों को नकदी में भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। भट्टियों के लिए कोयला आपूर्ति में कमी भी उद्योग की मुश्किलें बढ़ा रही है। एसोचैम ने पिछले पखवाड़े नोटबंदी के प्रभाव का आकलन करने के लिए लेदर के प्रमुख गढ़ आगरा, चेन्नई, कानपुर और कोलकाता के लगभग 100 लेदर कारखानाें के प्रतिनिधियों से बातचीत की। इन प्रमुख केंद्रों में लेदर उद्योग, नोटबंदी के कारण उत्पादन गतिविधियों में कई कठिनाइयों का सामना कर रहा है।
कच्चा माल, परिवहन, जनबल हर स्तर पर उद्योग भुगतान करने में असमर्थ है। अधिकांश उत्तरदाताओं ने कहा कि उनका उत्पादन 60 फीसदी से ज्यादा गिर चुका है और लेदर फैक्ट्रियों में श्रमिकों की संख्या भी लगभग 75 फीसदी कम हो चुकी है क्योंकि उन्हें समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है।
100 में से 60 उत्तरदाताओं ने कहा कि वे अब नोटबंदी के चलते निर्यात ऑर्डर नहीं ले रहे हैं क्योंकि वे समय पर ऑर्डर पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। कई प्रतिनिधियों ने कहा कि लेदर उद्योग को नोटबंदी के प्रभाव से उबरने में 9-12 माह का समय लगेगा। एजेंसी