महाराष्ट्र के ठाणे की एक सत्र अदालत ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म और धोखाधड़ी के आरोपों का सामना कर रहे 33 वर्षीय व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अगर किसी महिला और पुरुष के बीच शुरुआत से ही सहमति के आधार पर लंबे समय तक शारीरिक संबंध रहे हों, तो केवल शादी का वादा पूरा न होने को दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रूबी यू मालवंकर ने आरोपी शाहबाज मोहम्मद सलीम खान को भारतीय दंड संहिता की दुष्कर्म और धोखाधड़ी से जुड़ी धाराओं के तहत लगे सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत का यह आदेश 2 मई को पारित किया गया था, जिसकी प्रति रविवार को सार्वजनिक हुई।
मामले में महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शुरू से ही उसे शादी का झूठा भरोसा देकर संबंध बनाए और बाद में धोखा दिया। इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म, धोखाधड़ी, आपराधिक धमकी और अपमान से संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।
हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि दोनों के बीच संबंध करीब दो वर्षों तक चले और इस दौरान महिला ने कभी पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई। अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय तक चले संबंध से यह स्पष्ट होता है कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से थे।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि दो वर्षों तक चले संबंध के दौरान शिकायतकर्ता ने कभी यह संकेत नहीं दिया कि उसे धोखा दिया गया है। इससे यह प्रतीत होता है कि वह संबंध में समान रूप से सहभागी थी।
फैसले में अदालत ने महिला द्वारा लगाए गए आपराधिक धमकी और जानबूझकर अपमान के आरोपों पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि इन आरोपों को लेकर शिकायतकर्ता के बयान अत्यंत अस्पष्ट थे और उनमें स्पष्टता व ठोस प्रमाणों का अभाव था।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक आरोपों को स्पष्ट और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित न किया जाए। इन्हीं आधारों पर अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी करते हुए उसकी जमानत बांड समाप्त करने का आदेश दिया।