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Thane: सहमति से संबंध बनाने के बाद शादी न करना अपराध नहीं, कोर्ट ने बताया क्यों नहीं बनता दुष्कर्म का केस?

Mon, 11 May 2026 02:34 PM IST
रिया दुबे ठाणे, पीटीआई

सार

ठाणे सत्र कोर्ट ने एक व्यक्ति पर लगे दुष्कर्म और धोखाधड़ी से जुड़ी धाराओं के तहत लगे सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सहमति के आधार पर लंबे समय तक बने शारीरिक संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जा सकता है। 
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अदालत। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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महाराष्ट्र के ठाणे की एक सत्र अदालत ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म और धोखाधड़ी के आरोपों का सामना कर रहे 33 वर्षीय व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अगर किसी महिला और पुरुष के बीच शुरुआत से ही सहमति के आधार पर लंबे समय तक शारीरिक संबंध रहे हों, तो केवल शादी का वादा पूरा न होने को दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।

क्या है मामला?

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रूबी यू मालवंकर ने आरोपी शाहबाज मोहम्मद सलीम खान को भारतीय दंड संहिता की दुष्कर्म और धोखाधड़ी से जुड़ी धाराओं के तहत लगे सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत का यह आदेश 2 मई को पारित किया गया था, जिसकी प्रति रविवार को सार्वजनिक हुई।

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अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी और शिकायतकर्ता की मुलाकात ठाणे के एक मॉल में काम करने के दौरान हुई थी। महिला तलाकशुदा थी और उसकी दो बेटियां हैं। आरोप था कि आरोपी ने महिला से दोस्ती बढ़ाई और 2016 से 2018 के बीच शादी का वादा कर उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए। बाद में आरोपी ने कथित तौर पर शादी से इनकार कर दिया और महिला को धमकी भी दी।

महिला ने क्या-क्या लगाए थे आरोप?

मामले में महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शुरू से ही उसे शादी का झूठा भरोसा देकर संबंध बनाए और बाद में धोखा दिया। इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म, धोखाधड़ी, आपराधिक धमकी और अपमान से संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने क्या पाया?

हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि दोनों के बीच संबंध करीब दो वर्षों तक चले और इस दौरान महिला ने कभी पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई। अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय तक चले संबंध से यह स्पष्ट होता है कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से थे।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि दो वर्षों तक चले संबंध के दौरान शिकायतकर्ता ने कभी यह संकेत नहीं दिया कि उसे धोखा दिया गया है। इससे यह प्रतीत होता है कि वह संबंध में समान रूप से सहभागी थी।

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न्यायालय ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने शुरुआत से ही महिला को धोखा देने या उसका शोषण करने की दुर्भावनापूर्ण मंशा रखी थी। अदालत के अनुसार, केवल यह तथ्य कि बाद में शादी नहीं हुई, अपने आप में दुष्कर्म का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

फैसला सुनाते हुए अदालत ने क्या कहा?

फैसले में अदालत ने महिला द्वारा लगाए गए आपराधिक धमकी और जानबूझकर अपमान के आरोपों पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि इन आरोपों को लेकर शिकायतकर्ता के बयान अत्यंत अस्पष्ट थे और उनमें स्पष्टता व ठोस प्रमाणों का अभाव था।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक आरोपों को स्पष्ट और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित न किया जाए। इन्हीं आधारों पर अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी करते हुए उसकी जमानत बांड समाप्त करने का आदेश दिया। 

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