प्रधानमंत्री ने 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की, वित्त मंत्री पैकेज 1.0 को लेकर आई और उन्होंने लोन का मेला लगा दिया। नार्थ इंडिया सीआईआई लाइफ साइंसेज कमेटी के अध्यक्ष दिनेश दुआ का कहना है कि यह तो वहीं हाल हुआ, पहाड़ खोदा और चुहिया भी नहीं निकली।
एमएसएमई इंटरप्राइजेज के अनिल भारद्वाज का कहना है कि सरकार ने लंबी चौड़ी घोषणा की है, लेकिन पूछिए इसमें से कितने करोड़ वह अपने हिस्से दे रही है। भारद्वाज का कहना है कि लोन तो बैंक देगा, कर्ज सूक्ष्म, लघु, मझोले उद्योग चुकाएंगे। वह भी ब्याज के साथ। कर्ज के ब्याज में भी कोई कमी तो हुई नहीं है। यह तो राहत नहीं, सहयोग पैकेज है।
अनिल भारद्वाज का कहना है कि केंद्र सरकार ने एक ही संदेश दिया है कि कर्ज लो और खुद को पुनर्जीवित करो। पूरी घोषणा में एमएसएमई के लिए तीन लाख करोड़ का कर्ज ही सबसे बड़ी है। सरकार इसके लिए क्रेडिट गारंटी फंड बनाएगी। लेकिन लोन तो बैंक देंगे।
इसे चार साल में ब्याज के साथ लौटाना होगा। फंड ऑफ फंड की घोषणा की है। यह भी यही है। इसमें सरकार की जेब से क्या गया? इसमें राहत की बात केवल इतनी है कि लॉकडाउन के बाद कंपनियों के पास अपना कामकाज शुरू करने, लोगों को सैलरी देने की चुनौती है।
केंद्र सरकार ने यहां रास्ता दिखाया है कि कर्ज लेकर इसे वे पूरा करें। जिस तरह की स्थिति उत्पन्न हुई है, उसमें एमएसएमई के पास कर्ज लेने के सिवा कोई चारा नहीं है। क्योंकि कामकाज तो करना है।
जहां तक प्रश्न 200 करोड़ रुपये के ग्लोबल टेंडर न जारी करने का है तो अधिकांश क्षेत्रों में ऐसा नहीं होता था। कुछ विशेष क्षेत्र में ऐसा हुआ होगा, लिहाजा सरकार ने यह कदम उठाया है। लेकिन अधिकारी यदि चाहेंगे तो दो टेंडर इनकारपोरेट करके इसे 200 करोड़ से ज्यादा बना देंगे।
दिनेश दुआ और अनिल भारद्वाज दोनों का कहना है कि मुख्य मांग दो थी। पहली यह कि सरकार एमएसएमई कर्मचारियों के वेतन का भार झेल ले, दूसरा जो कर्ज पहले चल रहा है, उसमें राहत दे दे।
कम ब्याज पर कर्ज उपलब्ध कराए। यह नहीं हो पाया। जबकि अमेरिका, यूरोप समेत दुनिया के देशों ने इसी तरह की पहल की है। उन्होंने अपने देश के कर्मचारियों का छह महीने तक का 70-80 फीसदी तक वेतन का भार वहन किया है।
सरकार ने 15 हजार रुपया वेतन पाने वाले लोगों का कर्मचारी और नियोक्ता का पीएफ पहले तीन महीने तक जमा कराने की जिम्मेदारी ली थी, अब इसे बढ़ाकर छह महीना कर दिया। बस इसी मद में जो खर्च होगा, वह सरकार के खाते से जाएगा।