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सड़क हादसों के पीड़ितों की मदद करने वालों से नहीं होगी पुलिसिया पूछताछ, मिलेगा इनाम

Wed, 30 Mar 2016 10:21 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
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अब सड़क हादसों के शिकार लोगों की मदद करने वाले को पुलिस प्रताड़ना से दो-चार नहीं होना पड़ेगा। इस काम के लिए अब उन्हें इनाम मिलेगा। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना के पीड़ितों की मदद करने वालों (गुड समेरिटन) को पुलिस प्रताड़ना से बचाने संबंधी केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों को मंजूरी दे दी। इसकेतहत अब दुर्घटना पीड़ितों को नजदीकीअस्पताल में पहुंचाने वालों को पुलिसिया सवाल-जवाब के लिए वहां रुकना नहीं पड़ेगा और न ही उन्हें अपनी पहचान बताने केलिए बाध्य किया जा सकेगा।
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न्यायमूर्ति वी गोपालगौड़ा और न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की पीठ ने केंद्र सरकार को इन दिशानिर्देशों को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बड़े स्तर पर प्रचार-प्रचार करने के लिए कहा है, जिससे कि लोग दुर्घटना पीड़ितों की मदद केलिए सामने आएं। इसकेसाथ ही अदालत ने सेव लाइफ फाउंडेशन नामक एक संगठन द्वारा दाखिल याचिका का निपटारा कर दिया।

सेव लाइफ फाउंडेशन केसर्वेक्षण में पाया गया था कि चार में से तीन यानी 75 फीसदी लोग सड़क दुर्घटना पीड़ितों की मदद के लिए आगे नहीं आते। विधि आयोग की 201वीं रिपोर्ट में कहा गया था कि डॉक्टरों के मुताबिक 50 फीसदी मामले में दुर्घटना पीड़ितों की जान बचाई जा सकती है अगर उन्हें एक घंटे के भीतर अस्पताल में दाखिल करा दिया जाए। देश में हर वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में 1.37 लाख लोगों की मौत होती है।
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मालूम हो कि गत वर्ष दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने वालों को प्रोत्साहित करने केमद्देनजर सरकार ने कई दिशानिर्देश जारी किए थे। सुप्रीम कोर्ट केनिर्देश केबाद केंद्र सरकार ने ये दिशानिर्देश जारी किए थे। शीर्ष अदालत द्वारा इस दिशानिर्देश को हरी झंडी मिलने केबाद देश केतमाम अस्पताल, पुलिस सहित अन्य अथॉरिटी को गंभीरता से इसका पालन करना होगा।

ऐतिहासिक कदम

सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना के पीड़ितों की मदद करने वालों को पुलिस प्रताड़ना से बचाने संबंधी केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों को मंजूरी दे दी है। इस वजह से मददगारों का काम आसान हो गया है। 

हादसों की हकीकत 

सेव लाइफ फाउंडेशन के सर्वे के मुताबिक 75 फीसदी लोग मदद के लिए आगे नहीं आते।
दुर्घटना के पहले घंटे में पीड़ितों को अस्पताल ले आने पर आधे लोग बच सकते हैं।
देश में हर साल सड़क हादसों में 1.37 लाख लोग मौत के शिकार हो जाते हैं।
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क्या होगा इस फैसले से

- सड़क दुर्घटना पीड़ितों को नजदीकी अस्तपाल पहुंचाने वाले लोग (गुड समेरिटन) व चश्मदीद को तत्काल वहां से जाने दिया जाएगा। चश्मदीद सिर्फ अपना पता लिखवाकर वहां से जा सकेंगे।

- गुड समेरिटन से किसी तरह केसवालात नहीं किए जाएंगे। गुड समेरिटन पर किसी तरह की सिविल और आपराधिक जवाबदेही नहीं होगी।

- सड़क पर घायल पड़े लोगों केबारे में फोन से सूचना देने वालों को अपनी पहचान बताने केलिए बाध्य नहीं किया जाएगा।

- गुड समेरिटन के लिए निजी जानकारी, मसलन नाम, पता आदि बताना उनकी मर्जी पर निर्भर है। यहां तक कि अस्पताल में मेडिकल लीगल केस(एमएलसी) पर भी जानकारी देने के लिए उन्हें मजबूर नहीं किया जा सकता। अगर किसी भी सरकारी अधिकारी ने गुड समेरिटन को निजी पहचान बताने के लिए बाध्य किया तो उस अधिकारी केखिलाफ अनुशासनात्मक या विभागीय कार्रवाई होगी।

- अगर दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने वाला खुद को चश्मदीद बताता है तो पुलिस द्वारा जांच के दौरान या ट्रायल केदौरान उसे बयान दर्ज कराने के लिए उसे सिर्फ एक बार जाना होगा। राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि उन्हें किसी तरह की परेशानी न हो या उसे प्रताड़ित नहीं किया जाए। वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बयान दर्ज कराने की कोशिश की जानी चाहिए।

-स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय दिशानिर्देश जारी कर तमाम सरकारी और निजी अस्पतालों से कहेगा कि जब तक घायल व्यक्ति गुड समेरिटन का रिश्तेदार न हो तो उसे रजिस्ट्रेशन केलिए पैसे देने या दाखिला खर्च जमा करने केलिए बाध्य न किया जाए और न ही उसे वहां रहने केलिए मजबूर किया जाए। 

- अस्पताल को दुर्घटना पीड़ितों का तत्काल इलाज करना होगा। सड़क दुर्घटना के पीड़ितों केमामले में किसी डॉक्टर द्वारा किसी तरह की लापरवाही दिखाने पर उसकेखिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी।

- सभी अस्पतालों को अपने प्रवेश द्वार पर हिन्दी, अंग्रेजी और राज्य की भाषा में साफ और बड़े अक्षरों में यह लिखना होगा कि गुड समेरिटन को इलाज खर्च जमा करने केलिए बाध्य नहीं किया जाएगा और न ही उसे रोका जाएगा। ऐसा न करने पर अस्पतालों पर कार्रवाई होगी।
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