क्या देश के रेल मंत्री सुरेश प्रभु का इस बात का एहसास था कि जो रेल बजट वो फरवरी 2016 में पेश कर रहे हैं वो उनका अंतिम रेल बजट होगा? शायद नहीं, पर ऐसा हो सकता है कि क्योंकि अब रेल बजट को लेकर नीति आयोग ने सवाल खड़े कर दिए हैं।
नीति आयोग के सदस्य-अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय और किशोर देसाई ने 'डिसपेंसिंग विद द रेल बजट' नाम से 20 पेज का एक नोट लिखा है। इस नोट में लिखा रेल बजट को लेकर सवाल खड़े किए गए है।
साथ ही इस सालाना पेश होने वाले रेल बजट को असफल प्रयास बताया है। अब एनडीए सरकार ने रेल मंत्रालय से नोट पर उसकी टिप्पणी मांगी है।
रेल भवन के अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक आर्थिक मामले विभाग, वित्त सचिव और केंद्र सरकार में मुख्य सचिव को भी इस बात की जानकारी है।
इंडियन एक्सप्रेस की टीम को नीति आयोग का यह नोट हाथ लगा है। इसके मुताबिक वित्त मंत्रालय और रेलवे बोर्ड के सदस्यों को भविष्य का रोड मैप तैयार करने के लिए कहा गया है। इस नोट के मुताबिक रेलवे को ज्यादा मजबूती और तेजी देने का प्रस्ताव तैयार किया गया है।
नोट के मुताबिक वर्ष 1924 में पहली बार रेल बजट को आम बजट से अलग पेश किया गया था। ब्रिटिश राज से आज तक रेल बजट अलग से पेश होने के बावजूद इस क्षेत्र में निवेश बढ़ नहीं पाया है और रेलवे आज भी इसकी समस्या से जूझ रहा है।
नोट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि रेल बजट सिर्फ नई ट्रेन, नए रूट, नई घोषणाओं का पुलिंदा बन कर रह गया है। रेल बजट में रेलवे की जरूरत क्या है, इस पर ध्यान नहीं दिया जाता है।
सवाल उठाए गए हैं कि पिछले वर्ष के वित्तीय नतीजों के बजाए रेल बजट वार्षिक रिपोर्ट, विजन डॉक्युमेंट या नई नीतियों की घोषणाओं के आधार पर किया जाता है जोकि दूसरे मंत्रालय तैयार करते हैं। नोट में यह भी सवाल उठाए गए हैं कि रेल बजट में सरकार पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है पर गवर्नेंस पर कम ध्यान दिया जाता है।