अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में ही विभिन्न दलों की तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ धीरे धीरे समानांतर धुव्रीकरण (हिंदू वोटों का पैरेलल पोलराइजेशन) का दौर शुरू हुआ। 1984 में महज दो सीट और 8 फीसदी मत हासिल करने वाली भाजपा को 1989 में 86, फिर 161 सीट मिले। इसकेबाद 1998 और 1999 में पार्टी को 182 सीटों की बदौलत 13 महीने और 5 साल तक केंद्र की सरकार चलाने का मौका मिला।
वर्ष 2014 में पार्टी अपने दम पर बहुमत (31 फीसदी वोट और 282 सीटें) तो 2019 में 37 फीसदी वोट और 303 सीटें हासिल कर देश की राजनीति में छा गई। एक समय ब्राह्मण बनिया और हिंदी पट्टी की पार्टी कही जाने वाली भाजपा एक समय अपने और सहयोगियों की बतौलत 22 राज्यों में शासन करने वाली पार्टी बन गई।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी जिन्होंने शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने और विवादित परिसर का ताला खुलवाने के बाद कांग्रेस के दुष्चक्र में फंसने का दावा किया था उनका कहना था कि इसका यही अंजाम होना था। कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति ने भाजपा के हिंदुत्व की राजनीति को खाद पानी दिया।
नब्बे के दशक में मंडल के दौर में हिंदुत्व की राजनीति धीरे धीरे मजबूत हुई, मगर बाद में इसे कोई चुनौती देने वाला नहीं बचा। दरअसल मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ समानांतर ध्रुवीकरण की राजनीति मजबूत होती चली गई। इसी का परिणाम है कि केंद्र के साथ साथ ज्यादातर राज्यों में या तो भाजपा की सरकारें हैं या वह मुख्य विपक्ष की भूमिका में आ गई है।