अच्छे वादे, नेक इरादे। यह मोदी सरकार का नारा है। इस नारे के साथ सरकार अपने चार साल की इमेज को पेश कर रही है। इसी को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार संसद में अपना जोरदार तरीके से पक्ष रखेगी। समझा जा रहा है कि चर्चा का जवाब खुद प्रधानमंत्री देंगे। प्रधानमंत्री अपने भाषण में सबका साथ, सबका विकास का खुद के द्वारा किया गया वादा के इर्द गिर्द सरकार के कामकाज को बताएंगे।
वह मौजूदा सरकार को देश के गरीबों, किसानों, वंचितों, युवाओं की सरकार बताते हुए देश की सशक्त सुरक्षा नीति, विदेश नीति का खाका खीचेंगे। यह मौजूदा सरकार का आखिरी मानसून सत्र है। दस महीने बाद देश में आम चुनाव प्रस्तावित हैं। दिसंबर 2018 में मिजोरम, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होना है। इस चुनाव को 2019 में होने वाले आम चुनाव का सेमीफाइनल भी माना जा रहा है। ऐसे में उम्मीद है कि केंद्र सरकार पूरी सख्ती के साथ विपक्ष के आरोपों की हवा निकालेंगी।
व्यंग और तंज
सात घंटे की चर्चा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के जहर बुझे तीर चलने तय हैं। सत्ता पक्ष भी जहां अपने व्यंग्य और तंज से विपक्ष की धार भोथरी करेगा, केंद्र सरकार के नीतियों और इसको लेकर राज्यों में लगातार मिल रही सफलता को आधार बनाकर देश की जनता के मिल रहे समर्थन से जोड़ेगा, वहीं विपक्ष सूट बूट की सरकार, जुमले बाज सरकार, यूपीए की नीतियों का नाम बदलने वाली सरकार जैसे कुछ व्यंग-तंज से सरकार को घेरने की कोशिश कर सकता है।
किसे कितना होगा फायदा?
सरकार और सत्ता पक्षः
अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ मिली सफलता से उसे सदन की एक वैधानिक मंजूरी मिल जाएगी। केंद्र सरकार और सत्ता पक्ष इसका इस्तेमाल सरकार की छवि बनाने में कर सकता है। इसके अलावा वह राज्यसभा या लोकसभा में बिलों को पारित कराने में विपक्ष से मिलने वाले असहयोग को आधार बनाकर उस पर नैतिक दबाव बढ़ा सकता है।
विपक्षः
टीडीपी को आंध्र प्रदेश में राजनीतिक लाभ मिल सकता है। राज्य में जनता का रुख देखकर ही केंद्र सरकार को समर्थन दे रही टीडीपी ने अपने कदम खींचे थे। इसके बाद से ही उसने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न देने की मांग को लेकर संसद की कार्यवाही को बाधित करना, अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देना शुरू कर दिया था।
तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी समेत अन्य दलों केंद्र सरकार की भेदभावपूर्ण नीतियों तथा उसकी आलोचना करने का मंच मिलेगा।
कांग्रेस समेत उसके साथ सरकार के खड़े होने वाले विपक्षी दलों की एकता काफी मायने रखेगी। समझा जा रहा है कि यह एकता आने वाले समय में सत्ता पक्ष के खिलाफ लोकसभा चुनाव में खड़े होने वाले विपक्षी राजनीतिक दलों की एकजुट ताकत का एहसास कराएगा।