कुमार ने कहा कि यह बहुत अहम कदम है, जिसका फायदा भविष्य में लोगों के सामने स्पष्ट हो जाएगा। पहले यह आंकड़े हर पांच वर्ष में बनाए जाते थे, जो कि एक बहुत लंबा समय होता है। इस कारण से कोई स्पष्ट नीति नहीं बन पाती थी और अगर बनती भी थी, तो उसमें तमाम खामियां होती थीं।
उनके अनुसार शहरी क्षेत्रों में पहले (पांच वर्षों में) होने वाले सर्वे और अब (तीन महीने में) होने वाले सर्वे में बड़ा फर्क होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में भी यह अंतर नजर आ जाएगा। हर तीन महीने व सालाना आधार पर आंकड़े आने से वास्तविक स्थिति समझ में आ जाएगी।
गौरतलब है कि सरकार ने पिछले साल नीति आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में एक कार्यबल को गठित किया था। इस समिति को रोजगार आंकडे़ में विसंगतियों से निपटने के साथ रोजगार सृजन को बढ़ाने के समाधानों से संबंधित सुझाव देने थे।
मौजूदा सरकार लंबे समय से रोजगार के मुद्दे पर ध्यान दे रही है। हालांकि विपक्षी दलों द्वारा रोजगार में कमी आने के आधार पर सरकार को घेरने की कोशिश के बाद नए आंकड़े जुटाने की कवायद शुरू हुई।