नीति आयोग की 15 जून को होने जा रही गवर्निंग काउंसिल की बैठक में सभी मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष पांच-पांच मिनट तक बोलने का समय मिलेगा। खास बात है कि इस बार मुख्यमंत्रियों को अपने एजेंडे में भू-जल को अनिवार्य तौर पर शामिल करना होगा। साथ ही नीति आयोग अपनी एक रिपोर्ट पेश कर यह बताएगा कि किस राज्य ने 'गिरते भू-जल की स्थिति' में सुधार के लिए क्या कुछ किया है, उनकी रेटिंग क्या है और आने वाले समय में हालात कैसे होंगे, आदि।
पानी के संकट से निपटने के लिए नीति आयोग ने देश की आधी, करीब 450 नदियों को आपस में जोड़ने का एक विस्तृत प्रपोजल तैयार किया है। बरसात में या उसके बाद बहुत सी नदियों का पानी समुंद्र में जा गिरता है। अगर समय रहते इस पानी को उन नदियों में ले जाया जाए, जहां साल के अधिकतर महीनों में सूखा दिखता है तो आसपास के क्षेत्रों में कषि हो सकती है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में करीब साठ नदियों को आपस में जोड़ने का काम शुरु भी हो गया था। बता दें कि अक्टूबर 2002 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने सूखे व बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए भारत की महत्वपूर्ण नदियों को जोड़ने संबंधी परियोजना का खाका तैयार किया था। हिमालयी हिस्से के तहत गंगा, ब्रह्मपुत्र और इनकी सहायक नदियों के पानी को इकट्ठा करने की योजना बनाई गई।
पीएम मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में गंगा समेत देश की 60 नदियों को जोड़ने की योजना को मंजूरी दी थी। इसका फायदा यह होगा कि किसानों की मानसून पर निर्भरता कम हो जाएगी। पानी के अभाव में खराब हो रही लाखों हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई हो सकेगी। नदियों को जोड़ने से हजारों मेगावॉट बिजली भी पैदा होगी। ज्यादा पानी वाली नदियों मसलन गंगा, गोदावरी और महानदी को दूसरी नदियों से जोड़ा जाएगा। इसके लिए इन नदियों पर डैम बनाए जाएंगे। बाढ़-सूखे पर काबू पाने के लिए यही एकमात्र रास्ता बताया गया है।
-1951 में 14180 लीटर प्रतिदिन, प्रतिव्यक्ति भू-जल की उपलब्धता थी
-1991 में 6030 लीटर
-2001 में 5120 लीटर
-2020 में 3670 लीटर
-2050 में 3120 लीटर रह जाएगी
इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ ह्यूमन सेटलमेंट के मुताबिक, देश में औसतन 135 लीटर पानी प्रतिदिन प्रति व्यक्ति देने की बात कही जाती है, लेकिन यह औसत 69 लीटर पर ही अटक जाती है। भारत में करीब 54 फीसदी हिस्सा ऐसा है, जहां भू-जल तेजी से नीचे जा रहा है।
-वर्ल्ड रीसॉर्स इन्स्टिट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि 2030 में पानी की मांग 1.5 ट्रिल्यन क्यूबिक मीटर होगी, जबकि मौजूदा सप्लाई 740 ट्रिल्यन क्यूबिक मीटर है।