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NITI Aayog 4th Health Index: हेल्थ इंडेक्स में क्यों हमेशा बीमार रहता है यूपी, स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट गहरा क्यों है?

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Tue, 28 Dec 2021 04:25 PM IST

सार

नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2018-19 और 2019-20 के बीच 'वृद्धिशील प्रदर्शन' में यूपी नंबर 1 पर है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य ने 43 संकेतकों / उप-संकेतकों में से 33 में अपने प्रदर्शन में सुधार किया है। यूपी के प्रदर्शन को लेकर नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत सामने आए और उन्होंने कहा कि यूपी में सबसे ज्यादा सुधार हुआ है।
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यूपी में कोरोना - फोटो : PTI
कोरोना की दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था की पूरी कलई खुल गई थी। अस्पतालों में बिस्तरों के लिए मारामारी, ऑक्सीजन की कमी से लोगों की सांसों पर आए संकट और गंगा किनारे पटे और तैरती लाशों के खौफनाक मंजर की तस्वीरें अभी भी लोगों की जेहन में ताजा हैं। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि उत्तर प्रदेश में ऑक्सीजन की कमी से मौत की अनेक घटनाएं सामने आईं।

उसी दौरान यूपी की स्वास्थ्य व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि सूबे की स्वास्थ्य व्यवस्था राम भरोसे चल रही है। इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने भी केंद्र की भाजपा सरकार की तरह विधान परिषद में दावा किया कि प्रदेश में कोरोना वायरस महामारी की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी से किसी भी व्यक्ति की मौत की सूचना नहीं है। 


नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स में निचले पायदान पर यूपी
बहरहाल आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य यूपी की स्वास्थ्य व्यवस्था की चर्चा एक बार फिर हुई है। उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में देश में सबसे फिसड्डी साबित हुआ है। यह कहना है केंद्र सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग की एक रिपोर्ट का। नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स ने उत्तर प्रदेश को देश के सभी राज्यों में सबसे निचला स्थान दिया है। जबकि इसी इंडेक्स में केरल एक बार फिर अव्वल आया है। केरल के बाद तमिलनाडु दूसरे नंबर पर और तेलंगाना तीसरे नंबर पर हैं। 
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यूपी में कोरोना - फोटो : PTI
कोरोना की दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था की पूरी कलई खुल गई थी। अस्पतालों में बिस्तरों के लिए मारामारी, ऑक्सीजन की कमी से लोगों की सांसों पर आए संकट और गंगा किनारे पटे और तैरती लाशों के खौफनाक मंजर की तस्वीरें अभी भी लोगों की जेहन में ताजा हैं। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि उत्तर प्रदेश में ऑक्सीजन की कमी से मौत की अनेक घटनाएं सामने आईं।

उसी दौरान यूपी की स्वास्थ्य व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि सूबे की स्वास्थ्य व्यवस्था राम भरोसे चल रही है। इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने भी केंद्र की भाजपा सरकार की तरह विधान परिषद में दावा किया कि प्रदेश में कोरोना वायरस महामारी की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी से किसी भी व्यक्ति की मौत की सूचना नहीं है। 

नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स में निचले पायदान पर यूपी
बहरहाल आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य यूपी की स्वास्थ्य व्यवस्था की चर्चा एक बार फिर हुई है। उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में देश में सबसे फिसड्डी साबित हुआ है। यह कहना है केंद्र सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग की एक रिपोर्ट का। नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स ने उत्तर प्रदेश को देश के सभी राज्यों में सबसे निचला स्थान दिया है। जबकि इसी इंडेक्स में केरल एक बार फिर अव्वल आया है। केरल के बाद तमिलनाडु दूसरे नंबर पर और तेलंगाना तीसरे नंबर पर हैं। 

अमिताभ कांत, CEO, नीति आयोग - फोटो : ANI
यह चौथा साल है, जब नीति आयोग ने देश भर के राज्यों का हेल्थ इंडेक्स जारी किया है और केरल इसमें पहले नंबर पर है। इस इंडेक्स को जारी करते हुए नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा कि देश के तमाम राज्य अपने हेल्थ इंडेक्स का इस्तेमाल नीति निर्धारण और संसाधनों के आवंटन बेहतर बनाने के लिए कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह इंडेक्स एक ऐसी संघीय व्यवस्था की मिसाल हैं, जो एक साथ प्रतिस्पर्धात्मक और सहयोगात्मक दोनों हैं।

सरकार के विकास के दावे को चुनौती
चुनाव से ठीक पहले नीति आयोग की यह रिपोर्ट सरकार के विकास के दावों को चुनौती देती लगती है। हालांकि नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत के बयानों को देखें तो यूपी के लिए एक उमीद भी जगती है। उन्होंने कहा 'जब हम नवजात मृत्यु दर, बाल मृत्यु दर, जन्म के समय लिंग अनुपात, मेडिकल कॉलेज खोलने या गवर्नेंस के मुद्दे देखें तो इसमें यूपी का प्रदर्शन पिछले एक-दो साल में ठीक हुआ है। 2017 के बाद यूपी के स्वास्थ्य व्यवस्था में काफी सुधार हुआ है। इसलिए मैं यूपी को बधाई देता हूं क्योंकि हम सुधार देखना चाहते हैं और वह हो रहा है।'

स्ट्रेचर पर मरीज, तीमारदा के कंधे पर ऑक्सीजन सिलिंडर - फोटो : अमर उजाला
उत्तर प्रदेश के खराब स्वास्थ्य रिकॉर्ड के क्या कारण हैं
राज्य में 65-70 फीसदी सुविधाएं निजी हैं, फिर भी सरकारी प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर बहुत अधिक निर्भरता है। एक अनुमान के मुताबिक साल में लगभग 10 करोड़ लोग प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला स्वास्थ्य केंद्रों पर जाते हैं। राज्य में करीब 65-70 फीसदी सुविधाएं निजी हैं, फिर भी ज्यादातर लोग सरकारी प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के भरोसे  हैं। एक अनुमान के मुताबिक साल में लगभग 10 करोड़ लोग प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला स्वास्थ्य केंद्रों पर जाते हैं। 

इसके खराब स्वास्थ्य रिकॉर्ड के कई कारण हैं जिनमें मुख्य तौर पर स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों की कमी, स्वास्थ्य देखभाल की बढ़ती लागत और योजना की कमी जैसे कई कारकों का एक संयोजन है। भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों (आईपीएचएस) के मानदंडों के अनुसार, राज्य में ग्रामीण आबादी का एक तिहाई प्राथमिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे से वंचित है, जो भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के लिए ढांचागत और मानव संसाधन मानकों को निर्धारित करता है।

स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने में विफल रही सरकारें
उत्तर प्रदेश को अपनी आबादी की स्वास्थ्य संबंधी मांगों को पूरा करने के लिए 31,037 उप केंद्रों, 5,172 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और 1,293 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की आवश्यकता है। लेकिन आरएचएस-2015 के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य उप केंद्रों और पीएचसी 33 फीसदी और सीएचसी 40 फीसदी कम है। सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों की यह कमी केंद्र की स्वास्थ्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को प्रभावित करती है। राज्य सरकारें स्वास्थ्य देखभाल की इन जरूरतों की योजना बनाने और उन्हें प्राथमिकता देने में विफल रही हैं।

यूपी के फर्रुखाबाद का सरकारी अस्पताल
बुनियादी ढांचे का अभाव
यूपी सुसज्जित चिकित्सा संस्थानों जैसे बुनियादी ढांचे की कमी से जूझ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ निजी कॉलेज बनाए गए हैं, जहां कम वेतन के अलावा, रहने की उचित स्थिति की कमी के कारण पर्याप्त रूप से योग्य और पूर्णकालिक डॉक्टरों की भर्ती करना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण काम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार,किसी भी देश में एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर का होना अनिवार्य है। मगर यूपी में 3767 मरीजों पर मात्र एक डॉक्टर है।

प्रशिक्षित चिकित्साकर्मियों की कमी
विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूपी में चिकित्सा क्षेत्र में प्रशिक्षित जनशक्ति की भारी कमी है, जिसमें डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिक्स और प्राथमिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता शामिल हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति चिंताजनक है। जिला अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में खाली पद लंबे समय तक नहीं भरे जाते। 

उत्तर प्रदेश में गैर-मान्यता प्राप्त डॉक्टरों और झोलाछाप डॉक्टरों सहित निजी स्वास्थ्य प्रदाता 85 प्रतिशत चिकित्सा जरूरतों को पूरा करते हैं। सरकारी अस्पतालों पर बहुत दबाव है और यहां की प्रशासनिक व्यवस्थाएं कहीं कहीं भ्रष्टाचार से बुरी तरह जकड़ी हुई हैं। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूपी के तीन जिलों में एक सर्वेक्षण में एलोपैथिक क्लीनिक, छोटे और बड़े अस्पताल, और नैदानिक केंद्रों के सर्वेक्षण में यह पाया गया कि ये केंद्र मरीजों से ज्यादा मालिकों को लाभ पहुंचाने के लिए हैं।
 

बजट पेश करने जाते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो) - फोटो : amar ujala
सुधार क्या
हालांकि योगी सरकार अब प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। कोरोना महामारी को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इस साल अपने आखरी बजट में स्वास्थ्य सेवाओं पर विशेष जोर दिया है। सरकार ने अपने आखरी बजट में स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा विकसित करने के लिए 1073 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। स्वास्थ्य विभाग में रीढ़ की हड्डी की तरह काम करने वाले राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) को 5365 करोड़ रुपये की व्यवस्था बजट में की गई है।

यूपी के स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह ने इसी साल अक्तूबर में एक मीडिया हाऊस को दिए इंटरव्यू में बताया अप्रैल-मई यानी कोरोना महामरी की दूसरी लहर के दौरान आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को घर-घर जाने के लिए प्रशिक्षण देना शुरू किया गया। कोरोना महामारी कम होने के बाद जब डेंगू का प्रकोप बढ़ने लगा तो हमने प्रत्येक घर का सर्वेक्षण करने के लिए फील्डवर्कर्स का उपयोग करना शुरू कर दिया। 

लोगों को यह समझाया गया कि यदि आपको किसी भी प्रकार का बुखार है, जो दो-तीन दिन में नहीं उतर रहा है तो आपको सरकारी अस्पताल में आना चाहिए जहां आपका डेंगू और विभिन्न प्रकार का परीक्षण किया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्री के मुताबिक इन बीमारियों के लिए अब यूपी के लगभग हर जिले में सुविधा है।

सिद्धार्थनगर में पीएम मोदी। - फोटो : अमर उजाला।
डॉक्टरों की कमी दूर करने का प्रयास
इसी इंटरव्यू में स्वास्थ्य मंत्री ने दावा किया कि हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हमारे सभी अस्पतालों में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ हों। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में उचित दवाएं और प्रयोगशालाएं हों। 

हर जिले में मेडिकल कॉलेज की स्थापना
यूपी के हर जिले में मेडिकल कॉलेज स्थापित हो रहे हैं। 1947 से 2017 के बीच यूपी में केवल 12 मेडिकल कॉलेज थे। योगी आदित्यनाथ हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज बनाने पर जोर दे रहे हैं और नौ का उद्घाटन पहले ही प्रधानमंत्री कर चुके हैं।   किया जा रहा है। अन्य 12 मेडिकल कॉलेज का निर्माण जारी है और 16 जिले सार्वजनिक निजी भागीदारी मॉडल के तहत जा रहे हैं।

कुल मिलाकर यूपी के पास 100 सीटों वाले लगभग 45 मेडिकल कॉलेज होने जा रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने उम्मीद जताई थी कि  एक बार यह प्रणाली शुरू हो जाए तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कम से कम पांच साल तक काम करने के लिए एक अनुबंध प्रणाली के माध्यम से डॉक्टर मिल जाएंगे। इसलिए डॉक्टरों की कमी नहीं होगी।
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