निर्भया कांड के दोषी
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16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में एक 23 वर्षीय मेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में छह लोगों ने बेरहमी से सामूहिक दुष्कर्म किया। भीषण मारपीट के बाद उसे सुनसान जगह पर बस से बाहर फेंक दिया गया। 29 दिसंबर, 2012 को सिंगापुर के एक अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया। वीभत्स मामले ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया और लोग गुस्से में सड़क पर उतर आए। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं और भारत में महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन हिंसा के कानून को बदलने को लेकर बहस तेज हुई और रेप जैसे मामले में सजा को सख्त करने की मांग की गई।
जनता का गुस्सा देखकर सरकार भी हरकत में आई और जस्टिस वर्मा कमेटी को रेप लॉ में सुधार का काम सौंपा गया। कमेटी ने देश भर से मिले सुझावों के आधार पर इस जघन्य कांड के तीन माह के भीतर रेप और महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े कानूनों की समीक्षा की गई और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानून को सख्त बनाया गया।
निर्भया के दोषी
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एक नजर... निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानूनों में जो बदलाव हुए
आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013 को दुष्कर्म विरोधी अधिनियम के रूप में भी जाना जाता है।
इस बदलाव के तहत रेप की परिभाषा में पीछा करने, तेजाब से हमला करने और ताक-झांक जैसे नए अपराधों को जोड़ा गया
यहां तक कि रेप की धमकी भी अब एक अपराध है और इसके लिए व्यक्ति को दंडित किया जाएगा।
रेप के बढ़ते मामलों की संख्या में वृद्धि को देखते हुए न्यूनतम सजा को सात साल से बदलकर दस साल कर दिया गया।
जिन मामलों में पीड़ित की मृत्यु हो जाए या पीड़ित निष्क्रिय अवस्था में पहुंच जाए तो ऐसे मामले में न्यूनतम सजा को बढ़ाकर 20 वर्ष कर दिया गया।
निर्भया की मां और पिता
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नाबालिग आरोपियों पर सख्ती
चूंकि इस मामले में एक आरोपी किशोर था, इसलिए इस मामले के बाद व्यवस्था की एक और खामी की पहचान हुई। निर्भया कांड में शामिल नाबालिग आरोपी को जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत तीन साल से ज्यादा की सजा नहीं हो सकती थी। इसके बाद यह बहस छिड़ गई कि ऐसी खौफनाक घटना को अंजाम देने वाले को महज तीन साल की सजा देकर कैसे छोड़ा जा सकता है। उसके बाद रेप जैसे हिंसक अपराधों के लिए नाबालिग पर एक वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने की उम्र 18 से बदलकर 16 साल कर दी गई। इसके लिए किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में बदलाव किया गया।
इसमें शिकायत दर्ज करने और मेडिकल जांच कराने को भी शामिल किया गया। कानून में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि कोई भी अधिकारी जो दुष्कर्म का मामला दर्ज करने में विफल रहता है या इसकी जांच को रोकने का प्रयास करता है, वह एक अपराध करता है और उसके लिए दंड निर्धारित किए गए हैं।
एसिड अटैक
2. भारतीय दंड संहिता, 1860 में बदलाव
इसके तहत धारा 326ए और बी को शामिल किया गया जिसमें एसिड हमले के मुद्दे को कवर किया गया। संशोधिन अधिनियम के बाद एसिड अटैक को एक विशिष्ट अपराध बना दिया गया, जिसमें 10 साल की कैद या आजीवन कारावास या जुर्माना या दोनों हो सकता है।
धारा 354 A को शामिल किया गया जो यौन उत्पीड़न और उसके दंड से संबंधित है।
धारा 354 B के तहत किसी महिला को अपने कपड़े उतारने के लिए मजबूर करने को अपराध के दायरे में लाया गया।
धारा 354 C के तहत महिला के निजी अंगों को देखना अपराध माना गया।
पॉस्को
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धारा 354 D में किसी महिला का पीछा करने को भी अपराध की संज्ञा दी गई।
धारा 376 D सामूहिक दुष्कर्म के अपराध से संबंधित है। अपराधों की पुनरावृत्ति पर आजीवन कारावास या मृत्युदंड निर्धारित किया गया है।
निर्भया कांड के बाद रेप की परिभाषा व्यापक हो गई। संशोधित अधिनियम के तहत रेप के दायरे को बढ़ाया गया। निर्भया कांड से पहले सेक्सुएल पेनिट्रेशन को ही रेप माना जाता था। लेकिन इस कांड के बाद गलत तरीके से छेड़छाड़ और अन्य तरीके के यौन शोषण को भी रेप की धाराओं में शामिल किया गया।
पॉस्को एक्ट बना
बच्चों को लैंगिक उत्पीड़न से बचाने के लिए प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल ऑफेंसेस (पॉक्सो) एक्ट 2012 बनाया गया। इस एक्ट के तहत नाबालिग बच्चों के साथ होने वाले यौन शोषण और छेड़छाड़ के मामलों में कार्रवाई की जाती है। पॉक्सो एक्ट के तहत गिरफ्तार हुए आरोपी को आसानी से जमानत भी नहीं मिलती है।
दिल्ली पुलिस
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और क्या बदला?
दिल्ली में सुरक्षा कड़ी कर दी गई और गश्त बढ़ा दी गई।
पुलिस को ‘जेंडर सेंसेटाइज’ किया गया ताकि वे महिलाओं की सुरक्षा और उनसे जुड़े मुद्दों को समझ पाएं।
दिल्ली पुलिस बल में और महिला अधिकारियों को जोड़ा गया ताकि महिलाएं उनसे अपनी हर बात साझा कर सकें।
इसी तरह अन्य राज्यों में भी पुलिस बल में ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को शामिल करने की कोशिश की गई।
दुष्कर्म पीड़ितों को तत्काल सहायता प्रदान करने और आरोपियों को तुरंत सजा देने के मकसद से फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए।
महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा पर सख्त कानून सार्वजनिक चर्चा का विषय बना जिस पर पहले ज्यादा बात नहीं होती थी।
निर्भया केस
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निर्भया फंड की स्थापना
निर्भया कांड के बाद केंद्र सरकार ने निर्भया फंड की स्थापना की थी। इसका मकसद दुष्कर्म पीड़ितों के राहत और पुनर्वास की योजना के लिए बनाया गया था। निर्भया निधि में सरकार ने 1000 करोड़ रूपये की राशि का प्रावधान किया गया। इसमें प्रावधान है कि प्रत्येक राज्य सरकार, केन्द्र सरकार के सहयोग से दुष्कर्म सहित अन्य यौन अपराध की पीड़िताओं को मुआवजा देगी। अब तक करीब 20 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों में यह योजना लागू है।