कोरोना वॉरियर्स (सांकेतिक तस्वीर)
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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने केंद्र सरकार से कहा है कोरोना महामारी में जिन शिक्षकों की ड्यूटी लगाई गई है, उन्हें भी अन्य कर्मचारियों की तरह अग्रिम मोर्चे का कोरोना योद्धा माना जाए। साथ ही इन शिक्षकों को भी अन्य सभी कोरोना योद्धाओं की तरह पहले से घोषित बीमा और मुआवजे का लाभ दिया जाए। आयोग ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को इसके लिए सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को आदेश जारी करने का निर्देश दिया है।
आयोग ने मंत्रालय को यह भी निर्देश दिया है कि कोरोना महामारी में ड्यूटी के दौरान निधन होने वाले शिक्षकों के मुआवजे की रकम और अन्य सेवाओं का लाभ जल्द से जल्द उनके परिजनों को दिया जाए। आयोग ने यह आदेश मानवाधिकार कार्यकर्ता और सुप्रीम कोर्ट में वकील राधाकांत त्रिपाठी की याचिका पर दिया। त्रिपाठी ने अपनी याचिका में पूरे भारत से कई मामलों का उदाहरण देते हुए शिक्षकों को अग्रिम पंक्ति का योद्धा नहीं मानने का विरोध जताया था।
उन्होंने बताया था कि दादरा नगर हवेली में कोविड के चलते 10 अनुबंधित शिक्षकों का निधन हुआ। ये शिक्षक सरकार की तरफ से घर-घर जाकर कोरोना मरीजों का सर्वे करने व अन्य कोविड ड्यूटी में लगाए गए थे। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे विश्वविद्यालयों में युवा शिक्षकों और अनुभवी विद्वानों की बड़े पैमाने पर कोरोना के कारण मौत का भयावह मंजर देखने को मिला। उत्तर प्रदेश में हालिया पंचायत चुनावों की ड्यूटी में लगे सैकड़ों शिक्षकों का निधन कोराना से होने की बात सामने आई।
सीमांचल की दास्तां दर्दनाक
याचिकाकर्ता राधाकांत त्रिपाठी ने ओडिशा के गंजम जिले के शिक्षक सीमांचल सतपथी की दर्दनाक दास्तां भी आयोग के सामने रखी। कोविड ड्यूटी के दौरान कोरोना संक्रमण से पिछले साल 3 जुलाई को 27 वर्षीय सीमांचल का निधन हो गया, लेकिन 10 महीने बाद भी उसके नाम पर कोई पैसा जारी नहीं हो सका है। उसके माता-पिता ने भुवनेश्वर के अस्पताल में उसके निधन की खबर मिलते ही गंजम जिले के नारायणपुरसासन गांव में आत्महत्या कर ली।