राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने मणिपुर सरकार पर अनुचित कचरा प्रबंधन के लिए 200 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि सरकार जवाबदेही से बच रही है। उन्होंने कहा कि राज्य की जिम्मेदारी प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जरूरी संसाधनों के साथ एक व्यापक योजना बनाना है।
पीठ ने कहा कि अब समय आ गया है कि राज्य कानून और नागरिकों के प्रति अपने कर्तव्य का एहसास करे और अपने स्तर पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले संसाधनों की निगरानी करे। पीठ में न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और विशेषज्ञ सदस्य ए सेंथिल वेल भी शामिल हैं। खंडपीठ ने कहा कि कचरा प्रबंधन के विषय पर पर्यावरणीय मानदंडों का अनुपालन प्राथमिकता होना चाहिए।
न्यायाधिकरण ने कहा कि पहला बदलाव राज्य स्तर पर योजना, क्षमता निर्माण और अपशिष्ट प्रबंधन की निगरानी के लिए एक केंद्रीकृत एकल खिड़की तंत्र स्थापित करना है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि इसकी अध्यक्षता अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के एक अधिकारी को करनी चाहिए, जिसमें शहरी विकास, ग्रामीण विकास, पर्यावरण और वन, कृषि, जल संसाधन, मत्स्य पालन और उद्योग विभागों का प्रतिनिधित्व हो।
वहीं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने तेलंगाना सरकार पर 3,800 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। तेलंगाना सरकार पर भारी-भरकम जुर्माना इसलिए लगाया गया क्योकि वह ठोस और तरल कचरे का प्रबंधन नहीं कर पाई थी। इससे पहले एनजीटी पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार पर भी इसी तरह जुर्माना लगा चुकी है।
एनजीटी ने केरल पर नहीं लगाया हर्जाना
वहीं, एनजीटी ने अपशिष्ट जल का सही तरीके से प्रबंधन नहीं करने के संबंध में केरल सरकार पर पर्यावरणीय हर्जाना लगाने से परहेज किया। एनजीटी ने कहा कि सरकार सीवेज और दूषित पानी के प्रबंधन की दिशा में पहले ही लगभग 2,343 करोड़ रुपये देने का वादा कर चुकी है। एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति आदर्श गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मुख्य सचिव द्वारा दाखिल स्थिति रिपोर्ट के अनुसार सीवेज अपशिष्ट प्रबंधन में प्रति दिन 1,000 मिलियन लीटर (एमएलडी) से अधिक का अंतर है। पीठ में न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और विशेषज्ञ सदस्य ए सेंथिल वेल भी शामिल थे।