पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष कमर जावेद बाजवा ने 12 दिसंबर को आईएसआई के नए प्रमुख के तौर पर लेफ्टिनेंट जनरल नवीद मुख्तार को नियुक्त करने की घोषणा की। इसके बाद से ही नवीद मुख्तार के भारत के प्रति रवैये को लेकर सभी हिंदुस्तानियों में जिज्ञासा का भाव है। नए आईएसआई प्रमुख के लिखे एक रिसर्च पेपर के मुताबिक अफगानिस्तान में भारत को रोकने के लिए नवीद मुख्तार 'आक्रामक उपाय' अपनाने के समर्थक माने जाते हैं। ऐसा इसलिए ताकि काबुल को दिल्ली के लिए 'प्रॉक्सी' बनने से रोका जा सके।
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हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक नवीद मुख्तार ने पांच साल पहले एक रिसर्च पेपर लिखा था। इस पेपर के मुताबिक अमेरिकी सेनाओं के अफगानिस्तान छोड़कर जाने से पहले 'नरम तालिबान' के एक धड़े को काबुल सरकार में स्थापित कर देना चाहिए।
नवीद मुख्तार ने 'अफगानिस्तानः अल्टरनेटिव फ्यूचर एंड देयर इंप्लीकेशन' शीर्षक से इस रिसर्च पेपर को यूएस आर्मी वॉर कॉलेज में पढ़ाई के दौरान लिखा था। मुख्तार ने इस बात पर जोर दिया है कि अफगानिस्तान में भारत को रोकने के लिए पाकिस्तान को कदम उठाने चाहिए।
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'भारत पर नजर रखे पाकिस्तान'
फाइलः अफगान राष्ट्रपति और PM मोदी
- फोटो : PTI
उन्होंने लिखा है, 'पाकिस्तान का भूत, भविष्य और वर्तमान अफगानिस्तान के साथ जुड़ा हुआ है। एक शांत, एकजुट और स्थिर अफगानिस्तान, पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है और यह पाकिस्तान की नीति में प्राथमिकता पर होना चाहिए।'
क्षेत्र में महत्वपूर्ण शक्तियां सेक्शन में नवीद मुख्तार ने आगे लिखा है, 'भारत के लिए अफगानिस्तान के प्रॉक्सी बन जाने से रोकने के लिए पाकिस्तान को कदम उठाने चाहिए। अफगानिस्तान में भारत के बढ़ते प्रभाव पर पाकिस्तान को नजर रखनी चाहिए और इस बारे में भारत के प्रति आक्रामक रवैया अपनाना चाहिए।'
तालिबान और भारत के प्रति मुख्तार की सोच पाकिस्तान आर्मी के शीर्ष पर बैठे नीति नियंताओं की लाइन पर हैं। लंबे समय से रावलपिंडी में शीर्ष जनरल अफगानिस्तानी तालिबान के एक धड़े के साथ समझौते की दलील देते रहे हैं, जिसके नेताओं ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में सालों से शरण ले रखा है।
पाकिस्तान पर आतंक को समर्थन देने का आरोप
पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा
पाकिस्तानी जनरलों का मानना है कि ताालिबान मिश्रित काबुल सरकार अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव को रोकने के लिए सही दांव साबित होगी।
भारत और अमेरिका अक्सर पाकिस्तान पर अफगान तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के समर्थन का आरोप लगाते रहे हैं। इसके साथ ही अफगानिस्तान में भारतीय हितों पर हमले में आईएसआई का नाम भी जुड़ता रहा है।
भारत की एक चिंता का जिक्र करते हुए अपने रिसर्च पेपर में आईएसआई चीफ ने लिखा है, 'अफगानिस्तान में तालिबान नियंत्रित सरकार का लौटना और भारत के खिलाफ अफगान सरकार का आतंकवाद को समर्थन देना। इस कथित खतरे को लेकर नई दिल्ली चिंतित है।'
उन्होंने लिखा है, 'अफगानिस्तान की सरकार में तालिबान को जगह देने के लिए किसी भी समझौते का भारत विरोध करेगा क्योंकि यह एक नेक्सस (तालिबान, अलकायदा और जिहादी समूहों) को बनाता है, जो पाकिस्तान में बैठकर भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देते है।'
'अफगानिस्तान सरकार में तालिबान की वापसी को रोकने की यह मजबूत इच्छाशक्ति अमेरिका और पश्चिम के अफगानिस्तान से निकलने की रणनीति के समय काम कर सकती है, जब स्थानीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तालिबान के नरम धड़े को स्थापित करना आवश्यक लगे।
मुख्तार ने आखिर में लिखा है कि अगर भारत को यह लगता है कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार आ सकती है, तो वह इस संभावना को अस्थिर करने के लिए सबसे बड़ा कारक बनने की ओर बढ़ सकता है।