भारत में गरीबों की संख्या में तेजी से कमी आई है। इस मामले में पिछले आंकड़ा आठ साल पुराना है। 2011 के आंकड़ों के मुताबिक 26 करोड़ 80 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे थे। उस वक्त दैनिक करीब 134 रुपये कमाने वालों को गरीब माना गया था। नया आंकड़ा इस साल जून में आने वाला है। माना जा रहा है कि इस आंकड़े में कमी देखी जा सकती है। साल 2030 तक भारत के बेहद गरीबी के मामले मेंटॉप-10 देशों की लिस्ट से बाहर होने की उम्मीद जताई जा रही है।
भारत के मुख्य सांख्यिकीविद् प्रवीण श्रीवास्तव ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि घरेलू खपत का डेटा जून में जारी किया जाएगा। गरीबी का अनुमान इसी डेटा से लिया जाता है।
आधुनिक सांख्यिकी मॉडल के जरिए वैश्विक गरीबी पर नजर रखने वाली संस्था वर्ल्ड डेटा लैब के मुताबिक हो सकता है कि पांच करोड़ भारतीय 134 रुपये प्रतिदिन में गुजारा करते हैं। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक तेजी से हो रही आर्थिक प्रगति सामाजिक क्षेत्र में तकनीक के इस्तेमाल से देश में गरीबी के आंकड़ों में तेजी आ सकती है।
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी के प्रोफेसर एन भानुमूर्ति के मुताबिक प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना और मनरेगा और अन्य सामाजिक योजनाओं में सीधे खाते में पैसे भेजे जाने से भी फर्क पड़ा है। पूर्व सांख्यिकीविद् भी इस बात कि तस्दीक करते हुए कहते हैं कि वर्ल्ड डेटा लैब के आंकड़े सही साबित हो सकते है और पिछले कई सालों से लगातार गरीबी आंकड़ों में आ रही इस बार भी हो सकती है।
थिंकटैंक ब्रूकिंग्स की रिपोर्ट की मानें तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश बनने के साथ बेहद गरीबी को भी कम कर रहा है। दुनिया भारत की इस उपलब्धि पर हो सकता है कि तरफ ध्यान न दें। 2017-18 का पिछला सर्वे घरेलू खपत को व्यापक ढंग से लेता है। इसमें अतंरराष्ट्रीय मानकों के अुनसार अन्य वस्तुओं का मापन होगा।
वर्ल्ड डेटा लैब के अनुमान के मुताबिक 2019 के अंत तक भारत में अति गरीबों की संख्या पांच करोड़ से चार करोड़ तक आ सकती है। नाइजीरिया में गरीबों की संख्या सबसे ज्यादा है।