'भारत-रूस शिखर वार्ता की योजना बना रहे'
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बैठक को लेकर विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने कहा कि रूसियों के साथ हमारी वार्षिक शिखर वार्ता की परंपरा रही है। हम साल के अंत में एक शिखर वार्ता की योजना बना रहे हैं। यह एक वार्षिक अभ्यास है। इसी तरह संबंध बढ़ते हैं। मेरी वार्ता गैर सैन्य मुद्दों पर होती है। रक्षा मंत्री सैन्य मुद्दों पर वार्ता करते हैं।
हमारी बैठक इस पर केंद्रित थी कि हमारे संबंधों में क्या हो रहा है, हम कहां जा रहे हैं, हम क्या करेंगे? कुछ अच्छे विकास हुए। हमारा व्यापार थोड़ा बढ़ा है। हम इसे और बढ़ाना चाहेंगे। लोगों की कुछ गतिशीलता हुई है। हम इसे बढ़ते देखना चाहेंगे। हम रूस में अधिक बाजार पहुंच चाहते हैं।
'रूस-यूक्रेन संघर्ष जल्द से जल्द समाप्त हो'
विदेश मंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति पुतिन ने अलास्का से वापस आने के बाद वहां जो कुछ हुआ उस पर अपने विचार साझा किए। जहां तक हमारा रुख है, हम शुरू से ही इस बात को लेकर स्पष्ट रहे हैं कि हम रूस-यूक्रेन संघर्ष का जल्द से जल्द अंत देखना चाहेंगे। हमारा यह भी मानना है कि किसी भी संघर्ष को सुलझाना संबंधित पक्षों का काम होता है। इस विशेष मामले में, क्योंकि संबंधित पक्ष भी सहज हैं और अमेरिकियों ने पहल की है, इसलिए हम इन प्रयासों का समर्थन करते रहे हैं। हम ऐसे किसी भी प्रयास का समर्थन करते हैं जो इस बदलाव को ला सके। हम चाहते हैं कि संघर्ष का जल्द से जल्द अंत हो, जो स्पष्ट रूप से दोनों पक्षों को तय करना होगा। मुझे लगता है कि अलास्का में यह स्पष्ट था। वहां कई मुद्दों पर बातचीत हुई और कुछ बातों पर सहमति बनी।
'अमेरिका की वजह से चीन से रिश्ते गहरे हुए ऐसा नहीं है'
भारत-चीन संबंधों को लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि सब कुछ स्पष्ट नहीं है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका के साथ कुछ हुआ है, इसलिए तुरंत चीन के साथ कुछ हो गया है। अलग-अलग समस्याओं के लिए अलग-अलग समय-सीमाएँ होती हैं। मुझे लगता है कि हर चीज को एक साथ जोड़कर किसी विशिष्ट स्थिति के लिए एक एकीकृत प्रतिक्रिया बनाने की कोशिश करना एक गलत है। आज निश्चित रूप से एक वैश्विक परिदृश्य है। मैं चाहता हूं कि आप समझें कि एक विकास है। उस रिश्ते का एक प्रवाह है। लेकिन इस रिश्ते को इतना गहरा न बनाएं। यह वास्तविकता नहीं है।
'एक बाजार पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं'
विदेश मंत्री ने कहा कि हाल के अनुभव ने हमें सिखाया है कि किसी एक आपूर्ति श्रृंखला या किसी एक देश के स्रोत पर अत्यधिक निर्भर न रहें। किसी एक बाजार पर निर्भर न रहें। इसलिए यह केवल सोर्सिंग से उत्पादन तक नहीं है, यह उत्पादन से बाजार तक भी है। अब इसका मतलब यह नहीं है कि आप कहीं से स्विच ऑफ कर दें। इसका मतलब है कि आप विविधता लाते हैं, इसका मतलब है कि आप हेजिंग करते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात, जो सरकार का निरंतर संदेश है कि आप घर पर अधिक काम करते हैं। हम जानते हैं कि घर पर अधिक काम करना कठिन काम है। यह जटिल है, इसके लिए एक अलग तरह के प्रयास की आवश्यकता होती है। इसीलिए आत्मनिर्भरता पर जोर दिया जा रहा है।
अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों पर विदेश मंत्री ने कहा कि उनका एक-दूसरे के साथ इतिहास रहा है और उनके पास अपने इतिहास को नजरअंदाज करने का इतिहास भी है। हम ऐसी चीजें पहली बार होते नहीं देख रहे हैं। खास बात यह है कि कई बार अमेरिकी सेना ने इसके प्रमाण दिए हैं। यह वही सेना है जो एबटाबाद पाकिस्तान में गई थी और वहां किसे पाया था? वे राजनीति कर रहे हैं।