पद्म भूषण गोपालदास ‘नीरज’ को शायद अपनी मौत का अहसास पहले ही हो चुका था। करीब एक माह पहले उन्होंने अपने माथे पर दूसरे की चिता की राख लगाई थी। इसके बाद मृत्यु गीत भी सुना था। इस बात का खुलासा नीरज जी के शिष्य व लंबे समय से करीबी अमितेष आनंद ने किया। वे भी नीरज जी की तरह ओशो के समर्थक हैं।
बुलंदशहर में अपर जिला सांख्यिकी अधिकारी के पद पर कार्यरत अमितेष बताते हैं कि नीरज जी अपनी मौत से कुछ दिन पहले व्याकुल से रहने लगे थे। वे अपने शरीर के दर्द से काफी परेशान थे। इन परेशानियों से उनका ध्यान हटाने के लिए गीत-कविता का जिक्र छेड़ देता था। अमितेष कहते हैं कि करीब एक माह पहले मैं श्मशान गृह से चिता की राख लेकर उनके घर गया था।
मैंने दादा (नीरज जी) से बोला कि माथे पर लगाने के लिए चिता की राख लाया हूं। वे बोले, फिर देर कैसी। लगा दे मेरे माथे पर। इसका टीका लगाने के बाद मुझे मृत्यु गीत सुनाने का हुक्म दे दिया। मृत्यु-गीत सुनने के बाद भाव विह्वल हो गए। करीब घंटे भर तक नीरज जी गुमसुम रहे।
खूब खाई रबड़ी और मलाई के लड्डू
नीरज जी को रबड़ी और मलाई के लड्डू काफी पसंद थे। डॉक्टरों की मनाही के बाद भी वे इसे खाने से नहीं चूकते थे। अमितेष बताते हैं कि दादा ने अपने अंतिम दिनों में खूब रबड़ी और मलाई के लड्डू खाए। अंतिम कुछ दिनों में उनके पास मेरा आना जाना बढ़ गया था तो वे इन मिठाइयों को साथ लाने को कहते थे।