मुरादाबाद के 60 हजार कारीगर लगे हैं धातुओं से तैयार प्रॉडक्ट की ढलाई और पॉलिस के कारोबार में डिजिटल इंडिया के नारे के साथ प्रगति के पथ पर बढ़ रहे हिंदुस्तान के कुछ काम इस आधुनिक नारे को मुंह चिढ़ाते हुए दिखाई देते हैं। दुनिया में पीतल नगरी के नाम से मशहूर मुरादाबाद शहर पीतल प्रॉडक्ट के निर्यात के लिए अलग पहचान रखता है। जहां एक ओर आधुनिक युग में अधिकांश काम मशीनों से किए जाने लगे हैं वहीं मिट्टी से तैयार सांचे और 1200 डिग्री तापमान की खुली भट्टी पर आज भी पीतल और एल्यूमिनियम के प्रॉडक्ट तैयार किए जा रहे हैं।
इस काम में जुटे लोगों को रोजाना आग, धूल, तेजाब और करंट से जूझना पड़ता है। हालांकि इस काम के लिए मशीनें भी हैं लेकिन देश के कुछ चुनिंदा शहरों में ही इनकी उपलब्धता है। मुरादाबाद में आज भी करीब 60 हजार लोग परंपरागत तरीके से सांचे और भट्ठी पर काम कर रहे हैं। खास बात यह है कि किसी नए प्रॉडक्ट की डिजाइन को इस परंपरागत तरीके से ही तैयार किया जा सकता है। अगर खतरों की बात करें तो आग, धूल, तेजाब और तेजाब से जूझते हुए कारीगर सांस की तमाम बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं।
वहीं कारीगरों की कमाई को देखा जाए तो प्रॉडक्ट के मूल्य के सामने वह कुछ भी नहीं है। इसी का कारण है कि कारीगर आर्थिक तंगी से जूझता रहता है, जबकि उद्यमी आगे बढ़ते जाते हैं। सांचा तैयार करना यानी धातु के प्रॉडक्ट की मैन्यूफैक्चरिंग की शुरुआत : जिस प्रॉडक्ट को तैयार करना होता है उसके नमूने की डिजाइन को मिट्टी में शेप दिया जाता है। इससे सांचा तैयार होता है। पीतल अथवा एल्यूमिनियम की कच्ची सिल्ली को भट्टी में गलाकर सांचे में डाला जाता है। इससे प्रॉडक्ट तैयार होता है। बाद में सफाई के लिए ग्रांडर, तेजाब, निकिल, प्लेटिंग से गुजरते हुए बाजार के लिए प्रॉडक्ट तैयार होता है।