केरल में 94 वर्ष आई तबाही ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। एक ओर जहां भारी बारिश से 210 लोगों की मौत हो चुकी है वहीं 21 हजार करोड़ से अधिक के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है। हर साल मानसून के दौरान देश परेशानी से जूझता है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने आने वाले 10 वर्षों में बारिश और बाढ़ से होने वाले विनाश का एक अनुमान पेश किया है, इसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं। एनडीएमए का अनुमान है कि आने वाले 10 साल और कठिन होने वाले हैं इसकी वजह से जहां देश में 16,000 लोगों की मौत होने की संभावना है जबकि 47,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति बर्बाद होगी।
केंद्र सरकार इस तरह की किसी भी आपदा से निपटने की पुरजोर कोशिश कर रही है। सरकार का पूरा जोर आपदा खतरे में कमी (डीआरआर) लाने और आपदा से बचाव पर बनी हुई है। भारत के पास अभी आधुनिक सैटेलाइट और पूर्व चेतावनी प्रणाली मौजूद है, जिसकी मदद से मौसम का पूर्वानुमान लगाते हुए मौतों की संख्या में कमी लाई जा सकती है।
आधुनिकता से लैस होने के बाद भी अब तक सारी कवायद कागजों पर ही नजर आती है। जब भी कोई आपदा देश में आती है हम नई तरह की कोशिशों में जुट जाते हैं जो हमें इस बार केरल, उत्तर प्रदेश , बिहार और राजस्थान में दिखी। एनडीएमए ज्यादातर गाइडलाइन जारी करने, सेमिनार का आयोजन और बैठकें बुलाने तक सीमित दिखती है।
गृह मंत्रालय ने हाल ही में देश के 640 जिलों में आपदा के खतरों के बारे में एक सर्वेक्षण किया है। डीआरआर के तहत राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रदर्शन के आधार पर एक नैशनल रिजिल्यन्स इंडेक्स (एनआरआई) तैयार किया गया है। इसमें जोखिम का आंकलन, जोखिम से रोकथाम और आपदा के दौरान राहत जैसे मापदंड शामिल हैं। इस शोध में खुलकर आया कि हम अभी शुरुआती दौर में हैं और आपदा से जूझने में हमारा स्तर बहुत नीचे है। सर्वे में यह बात भी सामने आई कि हमें अभी बहुत अधिक सुधार की जरूरत है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 'ज्यादातर राज्यों ने अब तक खतरों का विस्तृत राज्यवार आंकलन, आपदा के बदलते जटिल स्वरूप और उससे बचाव के बारे में कोई काम नहीं किया है। राज्यों द्वारा किया गया आंकलन बहुत मामूली स्तर पर है और इसमें जिला या गांव के स्तर पर गहरे अध्ययन का अभाव है।'
एनडीएमए की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हिमाचल प्रदेश को छोड़कर किसी भी राज्य ने विस्तृत रूप से आपदा के खतरों का आंकलन नहीं किया है। साथ ही इस काम में किसी प्रफेशनल एजेंसी से मदद नहीं ली गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि , गुजरात ने करीब एक दशक पहले आपदा के खतरों को देखते हुए विस्तार से आंकलन किया गया था लेकिन बाद में इसमें कोई अपडेट नहीं हुआ, न ही इसे आम जनता के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया गया है न ही आम नागरिक को इससे निपटने के लिए उपाय सुझाए गए हैं।'