प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वही दांव खेला है जो 2007 में अचानक प्रतिभा पाटिल को सत्ताधारी यूपीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित करके कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चला था। तब पाटिल राजस्थान की राज्यपाल थीं और मराठी महिला कार्ड चलकर सोनिया ने तत्कालीन विपक्ष में सेंध लगाकर शिवसेना को यूपीए उम्मीदवार के साथ कर लिया था। अब कोविंद बिहार के राज्यपाल हैं और 'दलित कार्ड' चलकर मोदी ने मायावती नीतीश मुलायम के साथ कांग्रेस को भी समर्थन के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया है। तब जितनी सक्रिय राजनीति में प्रतिभा पाटिल गुमनाम थी उतने ही अब रामनाथ कोविंद हैं। हालांकि जैसा राजनीतिक अतीत पाटिल का था वैसा ही कोविंद का भी है।
अपने इस दांव से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ विपक्ष को दबाव में ला दिया है बल्कि पार्टी के भीतर के दिग्गजों और राष्ट्रपति बनने की महत्वाकांक्षा पाले बुजुर्गों को भी ताली बजाने को मजबूर कर दिया है। इस सियासी दांव ने गुजरात और सहारनपुर की घटनाओं की वजह से भाजपा के हाथ से फिसलती दलित राजनीति को भी साधने में मदद मिलेगी। फिर कोविंद गैर जाटव दलित हैं जिन्हें भाजपा बसपा के पाले से निकालने की कवायद लगातार कर रही है।
उत्तरप्रदेश के कानपुर देहात के रामनाथ कोविंद कोरी बिरादरी से आते हैं जो दलितों में संख्या बल के लिहाज से बहुत ज़्यादा नही है लेकिन उसकी मौजूदगी राज्य के लगभग हर गांव में है। इसलिए कोविंद का राष्ट्रपति भवन में पहुंचना 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को राहत देगा। कोविद पेशे से वकील हैं इसलिए उनकी कानून की जानकारी भी एक बड़ी योग्यता है। साथ ही उनका विनम्र स्वभाव भी सरकार और प्रधानमंत्री के लिए कोई संवैधानिक टकराव पैदा न होने की गारंटी है। संघ और भाजपा से जुड़े होने के बावजूद कोविंद की छवि कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी की नही है। इसलिए विपक्ष को भी उंगली उठाने का मौका नही है।
भले ही कोविंद का नाम कलाम या प्रणव मुखर्जी जैसा नही है लेकिन उनके राजनीतिक अनुभव और छवि युद्ध के इस राजनीतिक दौर में उनकी निर्विवाद छवि कोविंद को देश का प्रथम नागरिक बनने की अतिरिक्त योग्यता भी हैं।