पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की मुहिम नए सिरे से शुरू होगी। एनसीपी प्रमुख शरद पवार गैर भाजपा-गैर कांग्रेस दलों को एकजुट करने की कोशिशों में जुटे हैं। शिवसेना पहले ही पवार के नेतृत्व में विपक्षी दलों को एकजुट करने का प्रस्ताव रख चुकी है। अब तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई है।
बहरहाल, सबकी निगाहें पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर हैं। इस चुनाव में इस संभावना को हकीकत में बदलने की शुरुआत की जा रही है। मसलन सपा प्रमुख अखिलेश यादव, राजद के तेजस्वी यादव, झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया हेमंत सोरेन एनसीपी प्रमुख पवार के प्रयास से ही तृणमूल के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए राजी हुए हैं। खुद पवार ने चुनाव में प्रचार करने की व्यापक रणनीति बनाई है।
सात साल से जारी है प्रयास
विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश बीते सात साल से जारी है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कई मौकों पर विपक्षी दल एक मंच पर आए, मगर चुनाव में ये दल कोई स्पष्ट रणनीति नहीं बना पाए। तृणमूल सूत्रों के मुताबिक, रणनीति पहले गैर भाजपा-गैर कांग्रेस दलों को इकट्ठा करने की है क्योंकि कई क्षेत्रीय दल कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने को लेकर सहमत नहीं हैं। ऐसा इसलिए कि कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों का मुकाबला कांग्रेस से है। ये दल चाहते हैं कि विपक्षी एकता का चेहरा कोई गैर कांग्रेसी हो।
शिवसेना पहले ही दे चुकी है सुझाव
महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस की सहयोगी शिवसेना पवार के नेतृत्व में विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने का सुझाव पहले ही दे चुकी है। अब अंदरूनी तौर पर यह प्रस्ताव तृणमूल कांग्रेस की ओर से आया है। तृणमूल चाहती है कि चुनाव के बाद राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एक मोर्चा बने। इसका अपना एजेंडा और कार्ययोजना हो। इसी उद्देश्य से ममता की पार्टी की ओर से कई दलों को चुनाव प्रचार का निमंत्रण दिया गया है। राजद, झामुमो, सपा और एनसीपी ने ममता के समर्थन पर प्रचार करने के लिए हामी भी भरी है।
पवार ही क्यों?
दरअसल पवार के कई क्षेत्रीय दलों के प्रमुखों के साथ बेहतर संबंध हैं। इसके अलावा कई क्षेत्रीय दलों मसलन राजद, झामुमो, सपा, टीआरएस, बीजद जैसे दलों की मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा या उसकी सहयोगी है। इनका यह भी मानना है कि अगर कई क्षेत्रीय दल एक मंच पर आए तो कांग्रेस इस गठबंधन में बिना शर्त शामिल होने पर मजबूर होगी। पवार के टीआरएस, टीडीपी, डीएमके के वरिष्ठ नेताओं के साथ भी बेहतर संबंध हैं।