सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका पर 'आपत्तिजनक' सामग्री उजागर होने पर मीडिया की सराहना की। कोर्ट ने कहा कि अगर मीडिया ने यह मुद्दा सामने नहीं लाया होता, तो नुकसान 'पूरी तरह अपरिवर्तनीय' हो सकता था। कोर्ट ने किताब के प्रकाशन, दोबारा या डिजिटल प्रति साझा करने पर पूरी रोक लगा दी। पूरा मामला क्या है, पढ़ें रिपोर्ट-
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मीडिया का आभार जताया कि उसने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर आपत्तिजनक सामग्री को सार्वजनिक किया। कोर्ट ने कहा कि यदि मीडिया ने यह मुद्दा नहीं उठाया होता, तो (न्यायपालिका की छवि को) स्थायी नुकसान हो सकता था।
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चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने गुरुवार को किताब के किसी भी प्रकार के प्रकाशन, पुनर्प्रकाशन या डिजिटल वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। बेंच ने कहा कि किताब ने 'गोली चलाने' और न्यायपालिका को 'खून बहाने' का संदेश दिया गया है।
मीडिया की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण रही?
सुनवाई के दौरान एक वकील ने सुझाव दिया कि मीडिया को पाठ्यपुस्तक के आपत्तिजनक हिस्सों का खुलासा करने से रोका जाना चाहिए। इसके जवाब में सीजेआई ने कहा कि जिम्मेदार मीडिया मामले को जनता के सामने लाया, इसलिए उनका धन्यवाद किया जाना चाहिए।
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सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने कहा कि मुख्यधारा का मीडिया हमेशा जिम्मेदार रहता है। सीजेआई ने कहा कि लोकतांत्रिक और सांविधानिक मूल्यों को बनाए रखने में मीडिया का 'बहुत अहम, सकारात्मक और रचनात्मक' योगदान होता है। कोर्ट ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने तीन स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए सावधानी बरती थी।
किताब में क्या खामी थी?
बेंच को 24 फरवरी को एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब पर लेख 'समाज की खोज: भारत और उससे परे' (Exploring Society: India and Beyond) देखकर 'झटका' लगा। बेंच ने कहा कि किताब के अध्याय में न्यायपालिका के खिलाफ सैकड़ों शिकायतों का हवाला देकर यह संकेत दिया गया कि जैसे न्यायपालिका ने पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया हो। यह पूरी तरह से न्यायपालिका के ऐतिहासिक योगदान को नजरअंदाज करता है। कोर्ट ने कहा कि युवा विद्यार्थी अभी अपने शुरुआती वर्षों में सार्वजनिक जीवन और सांविधानिक ढांचे को समझना सीख रहे हैं। उन्हें पक्षपातपूर्ण जानकारी से परिचित कराना उचित नहीं है, जिससे स्थायी गलत धारणाएं बन सकती हैं।
एनसीईआरटी को क्या करना होगा?
बेंच ने निर्देश दिया कि एनसीईआरटी और शिक्षा विभाग सभी हार्ड और डिजिटल प्रतियों को जब्त करें और सार्वजनिक पहुंच से हटा दें। केंद्र और उसकी एजेंसियां सुनिश्चित करें कि किताब तुरंत सभी प्लेटफॉर्म से हटा दी जाए। कोर्ट ने कहा कि एनसीईआरटी निदेशक और उन विद्यालयों के प्रिंसिपल यह सुनिश्चित करें कि सभी कॉपियां जब्त और सील की जाएं और रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए, जहां किताब वितरित या पढ़ाई जा रही थी।