सुरक्षा बलों व आम नागरिकों की मौत में 90 फीसदी कमी
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 14 मार्च को लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा, वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) के संकट से समग्र रूप से निपटने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2015 में एक राष्ट्रीय नीति एवं कार्य योजना को मंजूरी दी थी। उक्त नीति के अंतर्गत एक बहुआयामी रणनीति की परिकल्पना की गई थी। इसमें सुरक्षा के उपाय, विकासपरक हस्तक्षेप तथा स्थानीय समुदायों के अधिकारों एवं हकदारियों को सुनिश्चित करना आदि शामिल था। इस नीति के दृढ़ कार्यान्वयन के परिणामस्वरूप पूरे देश में एलडब्ल्यूई हिंसा में निरंतर कमी आई है। एलडब्ल्यूई संबंधी हिंसा की घटनाओं में वर्ष 2010 के स्तर की तुलना में वर्ष 2022 में 77 फीसदी की कमी दर्ज हुई है। परिणामी मौतों 'सुरक्षा बलों और आम नागरिकों' में भी 90 फीसदी की कमी आई है, जो वर्ष 2010 में अब तक के सर्वाधिक स्तर 1005 से कम होकर 2022 में 98 हुई है।
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176 पुलिस स्टेशनों में ही एलडब्ल्यूई हिंसा
हिंसा के भौगोलिक विस्तार में भी पर्याप्त कमी हुई है। वर्ष 2022 में केवल 45 जिलों के 176 पुलिस स्टेशनों में ही एलडब्ल्यूई हिंसा रिपोर्ट की गई है। इसकी तुलना में वर्ष 2010 में अब तक के सर्वाधिक 96 जिलों के 465 पुलिस स्टेशनों में हिंसा रिपोर्ट की गई थी। भौगोलिक विस्तार में हुई कमी को सुरक्षा संबंधी व्यय (एसआरई) स्कीम के तहत अंतर्गत कवर जिलों की संख्या में आई गिरावट के रूप में भी देखा जा सकता है। एसआरई जिलों की संख्या अप्रैल 2018 में 126 से घटकर 90 हो गई थी। उसके बाद दोबारा से जुलाई 2021 में यह संख्या कम होकर 70 रह गई। झारखंड की सुरक्षा स्थिति में भी काफी सुधार हुआ है। राज्य में सुरक्षा वैक्यूम को लगभग समाप्त कर लिया गया है। सुरक्षा बलों द्वारा कैंप लगाकर और नियमित ऑपरेशनों को अंजाम देकर बूढा पहाड़, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां और खूंटी का ट्राई जंक्शन इलाका तथा पारसनाथ हिल्स जैसे स्थानों को माओवादियों की मौजूदगी से मुक्त करा दिया गया है। झारखंड में हिंसा की घटनाओं में 82 फीसदी की कमी हुई है, जो 2009 में सर्वाधिक 742 घटनाओं से कम होकर वर्ष 2022 में 132 हो गई है। इस प्रदेश में एसआरई जिलों की संख्या भी वर्ष 2018 में 19 से घटकर 2021 में 16 हो गई है।