केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक देश के सभी हिस्सों से 'नक्सलवाद' को पूरी तरह खत्म करने की घोषणा की है। छत्तीसगढ़, झारखंड व तेलंगाना और ओडिशा सहित अन्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सीआरपीएफ एवं दूसरे सुरक्षा बल, नक्सलियों पर शिकंजा कसते जा रहे हैं। नक्सलियों के शीर्ष कमांडर, जिन पर करोड़ों रुपये का इनाम रखा गया है, वे मारे जा रहे हैं। सरेंडर करने वाले नक्सलियों की संख्या में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है। नक्सलियों के खात्मे की डेड लाइन करीब आ रही है और इस बीच एक नया घटनाक्रम देखने को मिला है। नक्सल समूहों में हथियार डालने को लेकर रार मच गई है। 15 अगस्त को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने हथियारबंद संघर्ष को अस्थायी रूप से विराम घोषित की बात कही। इसके बाद कोई संघर्ष विराम नहीं हुआ तो अब 20 सितंबर को केंद्रीय कमेटी की तरफ से जारी पत्र में कहा गया कि दुश्मन को हथियार सौंप कर, मुख्यधारा में शामिल होना यानी पीड़ित जनता के साथ विश्वासघात करना, ये हमारी नीति नहीं है। माओवादियों की ताजा अपील में नेपाल का भीषण विरोध प्रदर्शन, जिसे 'Gen-Z' क्रांति का नाम दिया गया, का जिक्र हुआ है।
बता दें कि 15 अगस्त को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने केंद्रीय गृह मंत्री एवं नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के नाम एक अपील जारी की थी। इसमें शांति वार्ता की बात कही गई। हथियारबंद संघर्ष को अस्थायी रूप से विराम घोषित करने का निर्णय लिया गया। दूसरी तरफ सरकार ने इस अपील पर कोई ध्यान नहीं दिया। खुफिया इनपुट में यह बात सामने आई कि खात्मे की डेड लाइन करीब देख नक्सली अब भागने के रास्ते तलाश रहे हैं। हालांकि नक्सलियों ने 'आईईडी' को अपना अंतिम हथियार बनाया है। वे कदम-कदम पर 'इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस' (आईईडी) लगाकर सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। पांच किलोमीटर के अंतराल पर 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' (एफओबी) स्थापित किए जा रहे हैं।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चल रहे अभियान को लेकर विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों से इनपुट लिया जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि अब यह लड़ाई अपने अंतिम दौर में है। नक्सलियों के सामने अब दो ही विकल्प बचे हैं। पहला, सरेंडर कर दें या फिर गोली खाने के लिए तैयार रहें। यही वजह है कि अब नक्सली, सुरक्षा बलों के सामने आने से कतरा रहे हैं। वे सीधी मुठभेड़ से बच रहे हैं। उनके छिपने के ठिकानों को लेकर निरंतर सूचनाएं जुटाई जा रही हैं। अगले चार पांच माह में ऐसे कोई भी क्षेत्र नहीं बचेगा, जहां सुरक्षा बलों की पहुंच न हो।
आने वाले दिनों में बड़े स्तर पर नक्सलियों द्वारा 'सरेंडर' किए जाने की खबरें देखने को मिलेंगी। माओवादियों द्वारा 20 सितंबर को जारी पत्र में भी दो प्रवक्ताओं के हस्ताक्षर हैं। एक अभय और दूसरा विकल्प, इन्हीं के नाम से पत्र जारी हुआ है। पत्र में लिखा है कि कामरेड सोनू ने 'अभय' के नाम से 15 अगस्त वाली अपील जारी की थी। उस अपील में 'संघर्ष विराम' की मनमाफिक व्याख्या की गई है। वह अपील जारी करना, पार्टी महासचिव कामरेड बसवराज (किशन) जो अब मारे जा चुके हैं, द्वारा शांति वार्ता की दिशा में जारी की गई नीतियों की मनगढंत व्याख्या कर, विश्वासघात किया गया है।
कामरेड सोनू के उस बयान को केंद्रीय समिति का आधिकारिक बयान बताया जा रहा है। इसी के चलते अब 20 सितंबर की अपील में स्पष्टीकरण दिया गया है। कामरेड बसवराज (किशन) शांति वार्ता के लिए हथियार छोड़ने के खिलाफ थे। उन्होंने कभी भी ऐसा निर्देश नहीं दिया था। कामरेड बसवराज ने कहा था कि क्रांतिकारी आंदोलन, वर्ग संघर्ष और जनयुद्ध के जरिए ही आगे बढ़ सकता है। दुश्मन को हथियार सौंपकर मुख्यधारा में शामिल होने की बात, ये दुश्मन की चाल है। यह क्रांतिकारी आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी।
अपील में कामरेड विकल्प के हस्ताक्षर के नीचे केंद्रीय कमेटी पोलित ब्यूरो, दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी लिखा है। पार्टी, कामरेड सोनू की अपील की निंदा करती है। यह एक कपटपूर्ण अपील है। हथियार छोड़ने के लिए कामरेड सोनू का मत (अकेले) पर्याप्त नहीं है। इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए पार्टी समितियों, पार्टी नेतृत्वकर्ताओं, जनसंगठन, जनांदोलन और बाहरी शक्तियों से राय–मशविरा करना आवश्यक है। सोनू और उसके साथ अगर सरेंडर करना चाहते हैं तो करें। वे अपने हथियार सुरक्षा बलों को नहीं, पार्टी को सौंप दें। इसके लिए पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी 'पीएलजीए' को निर्देश दिया गया है कि सरेंडर से पहले ऐसे लोगों के हथियार जब्त कर लें। अब हथियार छोड़ने का मतलब, क्रांतिकारी पार्टी को संशोधनवादी पार्टी में बदल देने के बराबर होगा।
पार्टी, क्रांतिकारी आंदोलन को और मजबूत करेगी और जनयुद्ध को आगे बढ़ाएगी। हथियार छोड़ने की बात, दुश्मन की चाल है। पार्टी इसे कभी भी स्वीकार नहीं करेगी। पत्र में आखिर में कहा गया है कि अगर कामरेड सोनू 'हथियारबंद' संघर्ष को अस्थायी रूप से त्यागना चाहते हैं तो यह बात सिर्फ धोखाधड़ी है। इस बात को अपनाने का रास्ता, संसदीय चुनावी रास्ता होगा। ये 'नेपाली' क्रांति की गद्दर परंपरा की तरह होगा, जिसे अपनाने का मतलब नया संशोधनवाद होगा।