भारतीय नौसेना जल्द ही छह स्वदेशी पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण के लिए 50,000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजना का टेंडर जारी करेगी। हालंकि इन पनडुब्बियों में स्वदेशी एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) सिस्टम नहीं लगाया जाएगा। एआईपी का विकास डीआरडीओ द्वारा किया जा रहा है।
एआईपी तकनीक पारंपरिक पनडुब्बियों को पानी के भीतर रहने की क्षमता बढ़ाती है। यदि इसका इस्तेमाल न किया जाए तो अपनी बैटरी रिचार्ज करने के लिए ऑक्सीजन का उपयोग करने के लिए पनडुब्बियों को सतह पर आना पड़ता है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद ने हाल ही में देश के भीतर छह नई पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के निर्माण के लिए भारतीय नौसेना को पी-75 इंडिया नामक लगभग 50,000 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी दी है। पी-75 इंडिया इस परियोजना का कोड नाम है।
डीआरडीओ दे रहा एआईपी के इस्तेमाल पर जोर
सूत्रों ने एएनआई को बताया, 'रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन पी-75 इंडिया पर अपने द्वारा विकसित किए जा रहे एआईपी को शामिल करने पर जोर दे रहा है, लेकिन इसे अभी तक टेंडर में शामिल नहीं किया गया है।' सूत्रों के अनुसार, भारतीय नौसेना ने डीआरडीओ से कहा है कि स्कॉर्पीन-श्रेणी की पनडुब्बियों पर डालने की अनुमति देने से पहले एक प्लेटफॉर्म पर एआईपी को सिद्ध करें।
डीआरडीओ ने इस साल मार्च में कहा था कि उसने स्वदेशी एआईपी प्रणाली के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर हासिल किया है। उद्योग भागीदारों के सहयोग से डीआरडीओ की नौसेना सामग्री अनुसंधान प्रयोगशाला (एनएमआरएल) द्वारा विकसित कर रहा है। माना जा रहा है कि नौसेना अपनी इन पनडुब्बियों के लिए विदेशी एआईपी आपूर्तिकर्ताओं को टेंडर की रेस में शामिल होने की इजाजत देगी। पनडुब्बी निर्माण में दो साल का वक्त लगने की संभावना है। इसके बाद ही उसे एआईपी के आपूर्तिकर्ता की तलाश करना पड़ेगी। डीआरडीओ चाहता है कि इन पनडुब्बियों में स्वदेशी एआईपी का इस्तेमाल हो।