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स्मृति शेष: नटवर सिंह...कूटनीति में माहिर राजनेता, साफगोई के सभी कायल; नौकरशाह से केंद्रीय मंत्री तक का सफर

Mon, 12 Aug 2024 05:30 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

नटवर सिंह ने कूटनीति और राजनीति के अलावा लेखन में भी हाथ आजमाया। विदेश मामलों पर कई किताबों के अलावा द लिगेसी ऑफ नेहरू : अ मेमोरियल ट्रिब्यूट और माई चाइना डायरी 1956-88 उनकी चर्चित किताबों में शुमार है। सबसे ज्यादा सुर्खियों में रही उनकी आत्मकथा वन लाइफ इज नॉट इनफ।
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पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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नौकरशाह से केंद्रीय मंत्री तक का सफर तय करने वाले कुंवर नटवर सिंह उन राजनेताओं में शुमार थे, जो कूटनीति के माहिर माने जाते रहे हैं। अपनी साफगोई और हाजिर-जवाबी से खास पहचान बनाने वाले नटवर सिंह नेहरू-गांधी परिवार के बेहद करीबी रहे। हालांकि, जब उन्होंने पार्टी से बगावत की तो पलटकर 10 जनपथ की तरफ देखा तक नहीं।

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उन्हें हमेशा यह टीस सालती भी रही, जिसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया। नटवर सिंह ने कूटनीति और राजनीति के अलावा लेखन में भी हाथ आजमाया। विदेश मामलों पर कई किताबों के अलावा द लिगेसी ऑफ नेहरू : अ मेमोरियल ट्रिब्यूट और माई चाइना डायरी 1956-88 उनकी चर्चित किताबों में शुमार है। सबसे ज्यादा सुर्खियों में रही उनकी आत्मकथा वन लाइफ इज नॉट इनफ। दरअसल, इस किताब के प्रकाशित होने से पहले ही उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि वह अपने सीने में दफन कई राज खोलने जा रहे हैं। इसके कुछ ही समय बाद प्रियंका गांधी वाड्रा उनसे मिलने पहुंची थीं। उस समय कहा गया कि नटवर सिंह गांधी परिवार से जुड़े कुछ गहरे राज खोलने जा रहे थे और इसी से डरकर वह उनसे मिलने पहुंची थीं। हालांकि, न तो किताब में ऐसा कोई राज नजर आया और न ही बाद में नटवर सिंह ने ही कभी इस पर खुलकर कुछ बताया।

राजीव गांधी से नजदीकी सोनिया के सियासी गुरु
नटवर सिंह को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और फिर उनके बेटे राजीव गांधी का बेहद करीबी माना जाता था। राजीव की हत्या के बाद सोनिया गांधी को कदम-कदम पर पार्टी के भीतर की चुनौतियों से उबारने में नटवर सिंह की कूटनीतिक समझ काफी काम आई। उन्हें इसका इनाम भी मिला और 2004 में मनमोहन सिंह की यूपीए-1 सरकार में उन्हें विदेश मंत्री का पद मिला।
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तेल के खेल ने बिगाड़ दी सारी बात
2005 में नटवर सिंह को कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। वजह बनी ईरान से तेल के बदले अनाज में कथित धांधली को लेकर पोल वोल्कर समिति की रिपोर्ट, जिसमें नटवर सिंह का नाम भी शामिल था। इसके बाद ही सोनिया के साथ पहले उनका मनमुटाव हुआ और फिर धीरे-धीरे रिश्ते तल्ख होते चले गए।

पहला चुनाव जीतकर ही मंत्री पद संभाला
नटवर सिंह का जन्म 1929 में राजस्थान के भरतपुर जिले में हुआ था। उन्होंने मेयो कॉलेज, अजमेर और ग्वालियर के सिंधिया स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और फिर दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली। 1953 में भारतीय विदेश सेवा के लिए चुने गए थे, लेकिन 1984 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफा दे दिया। उन्होंने चुनाव जीता और 1989 तक केंद्रीय राज्य मंत्री के रूप में सेवाएं दीं।

  • इससे पहले, बतौर नौकरशाह नटवर सिंह ने चीन, अमेरिका, पाकिस्तान और ब्रिटेन जैसे देशों में महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दीं।

अनुभवी अधिकारी सियासत के धुरंधर

  • 1983 में नई दिल्ली में आयोजित सातवें गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन के महासचिव और उसी वर्ष आयोजित राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक के मुख्य समन्वयक रहे।
  • मार्च 1982 से नवंबर 1984 तक विदेश मंत्रालय में सचिव रहे।
  • 1984 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
  • 1984 में कांग्रेस में शामिल हुए और राजस्थान के भरतपुर से लोकसभा सदस्य चुने गए।
  • 1985 में इस्पात, कोयला एवं खान तथा कृषि मंत्रालय में राज्य मंत्री बने। 1986 में विदेश राज्य मंत्री का पद संभाला।
  • 2008 के मध्य में उन्होंने और उनके बेटे जगत ने मायावती की बसपा का हाथ थामा लेकिन नुशासनहीनता में उन्हें चार महीने बाद ही पार्टी ने बाहर कर दिया गया।

विदेश नीति में समृद्ध योगदान

नटवर सिंह के निधन से दुखी हूं। उन्होंने कूटनीति और विदेश नीति की दुनिया में समृद्ध योगदान दिया। वह अपनी बुद्धिमत्ता के साथ-साथ बेहतरीन लेखन के लिए भी जाने जाते थे। दुख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिवार और प्रशंसकों के साथ हैं। -नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

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