दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों की आर्थिक सहायता के लिए सरकार ने राष्ट्रीय नीति को लागू किया लेकिन जमीनी स्तर पर इस योजना का लाभ पीड़ितों को नहीं मिल पा रहा है। स्थिति यह है कि सरकारी कागजों में कैद इस नीति के लागू होने पर भी इलाज के अभाव में मरीजों की मौत हो रही है। हाल ही में चैन्ने स्थित द इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ एंड हॉस्पिटल (आईसीएच) में एक आठ वर्षीय बच्ची ने दम तोड़ दिया।
डॉक्टरों का मानना है कि दुर्लभ बीमारियों से ग्रस्त रोगी की अगर एक भी खुराक किसी कारण छूट जाती है तो इसका स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उपचार में देरी होने से पिछले उपचार की लागत और असर खत्म होने लगता है। इसी साल दो सितंबर को रेयर डिजीज इंडिया फाउंडेशन ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया को पत्र लिख कई अहम बिंदुओं पर ध्यान देने की अपील की। इसमें राष्ट्रीय नीति का लाभ चार महीने बाद भी मरीजों को न मिलने के साथ साथ क्राउडफंडिंग में शामिल रोगियों की गंभीर हालत का जिक्र किया गया।
1.15 करोड़ में होगा गोचर का इलाज
नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में इस समय कुल 55 और मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में 41 मरीज पंजीकृत हैं। दिल्ली एम्स में इलाज कराने वाली 22 वर्षीय कनिका सिंह गौचर बीमारी से पीड़ित है। बुराड़ी निवासी कनिका के पिता गुरु प्रकाश ने बताया कि उनकी बेटी के इलाज में डॉक्टरों ने कुल खर्च 1.15 करोड़ रुपये का बताया है। उनके बार बार अपील करने पर एम्स ने डिजिटल क्राउडफंडिंग की सूची में कनिका का नाम दिया है।
दूसरों के दान का हमें इंतजार
बिहार के वैशाली जिला निवासी अभिज्ञान दीपक का इलाज मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में चल रहा है। एमपीएस 1 पीड़ित इस 12 वर्षीय बच्चे के इलाज में कुल खर्च 50 लाख रुपये से भी अधिक है। ऐसे यहां 41 मरीज हैं जिनमें किसी को 40 लाख तो किसी को दो करोड़ रुपये तक का खर्च इलाज पर होगा।
इलाज में लाखों रुपये का खर्च, जांच और दवा सब महंगी
दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीज दोहरी मार झेलते हैं। अगर सामान्य तौर पर देखें तो दुर्लभ बीमारी ग्रस्त रोगी के लिए जीवन रक्षक एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी (ईआरटी) की वार्षिक लागत 20 लाख रुपये तक है जबकि गौचर के लिए 29 लाख, एमपीएस 1 के लिए 51 लाख और पोम्पे के लिए 53 लाख रुपये तक का खर्च आता है। संशोधित राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के तहत एक मरीज को 50 लाख तक की आर्थिक सहायता मिल सकती है जो कुछ समय पहले 25 लाख थी।
क्या है दुर्लभ रोग
दुर्लभ बीमारी एक ऐसी स्वास्थ्य स्थिति होती है जिसका प्रचलन लोगों में प्रायः कम पाया जाता है या फिर यूं कहें कि सामान्य बीमारियों की तुलना में कम लोग इनसे प्रभावित होते हैं। दुर्लभ बीमारियों की सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत परिभाषा नहीं है। 80% दुर्लभ बीमारियां आनुवंशिक होती हैं, इसलिए बच्चों पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। देश में 5.6-7.2 करोड़ लोग दुर्लभ बीमारियों से प्रभावित हैं।
देश के 10 अस्पतालों को बनाया केंद्र
सरकार ने राष्ट्रीय नीति 2021 के तहत दुर्लभ बीमारियों से ग्रस्त मरीजों के लिए 10 अस्पतालों को केंद्र बनाए हैं जो अलग अलग राज्य में हैं। यहां कुल 429 मरीज पंजीकृत हैं जिनमें से 20 बच्चों को तत्काल उपचार जारी रखना है। हालांकि कुल मरीजों की तुलना में यह संख्या बेहद कम है। इसके अलावा, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने डिजिटल प्लेटफार्म पर दुर्लभ रोग ग्रस्त मरीजों के लिए क्राउडफंडिंग भी शुरू की है लेकिन मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि अभी तक केवल 2.13 लाख रुपये का दान ही यहां एकत्रित हो पाया है।