गांधी परिवार प्रवर्तन निदेशालय की जांच के घेरे में है। राहुल गांधी लगातार दूसरे दिन जांच एजेंसी के सामने पेश हुए और उसके सवालों का जवाब दिया। आज से लगभग 10 साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी तरह एसआईटी के सामने पेश होकर उसके सवालों का सामना किया था। लेकिन उन्होंने बिना किसी राजनीतिक आरोप लगाए, इन मुश्किलों का सामना किया और इससे बाहर निकलने में कामयाब हुए। इसके बाद वे बेहद ताकतवर व्यक्ति बनकर उभरे और प्रधानमंत्री की कुर्सी तक जा पहुंचे। क्या राहुल गांधी भी पीएम मोदी की तरह इस जांच के बाद लोकप्रिय होकर उभरेंगे और क्या यह समय कांग्रेस के लिए एक टर्निंग प्वाइंट बनकर उभरेगा?
आज मोदी सरकार लगभग उन्हीं आर्थिक परिस्थितियों का सामना कर रही है जैसा कि मनमोहन सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम समय में कर रही थी। इस समय मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल चल रहा है, उस समय पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल चल रहा था। मनमोहन सिंह सरकार उस समय तेल कीमतों में बढ़ोतरी, महंगाई, बेरोजगारी और रूपये के गिरते मूल्यों की विकट स्थिति का सामना कर रही थी। उसके कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे।
आज मोदी सरकार भी लगभग उन्हीं चुनौतियों से घिरी हुई है। रुपये का मूल्य गिरकर अब तक के सबसे निचले स्तर (78.28 रुपये प्रति डॉलर तक) पहुंच चुके हैं। खुदरा महंगाई अप्रैल के 7.8 फीसदी के मुकाबले कुछ कम होकर मई में 7.0 फीसदी पर आ गई है। पेट्रोल के दाम कम करने के बाद भी कई शहरों में 100 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा पर चल रहे हैं। अर्थव्यवस्था के जानकार इससे विकास के प्रभावित होने की आशंका जताने लगे हैं। कई जांच एजेंसियों ने देश की विकास दर का अनुमान घटा दिया है।
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने कहा कि जिस प्रकार 2012-14 में विपक्ष के नेता के रूप में नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह सरकार पर जोरदार हमला बोला और उसका राजनीतिक लाभ उठाया, उसी प्रकार आज राहुल गांधी की स्थिति मजबूत है। वे महंगाई, पेट्रोल के दाम, बेरोजगारी और रूपये के गिरते मूल्यों पर केंद्र सरकार को घेर सकते हैं जो उनकी राजनीतिक स्थिति को मजबूत कर सकती है। वे ऐसा करने की कोशिश कर भी रहे हैं। लेकिन मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, पार्टी में अंतर्विरोध और जमीनी लड़ाई के अभाव में वे वह असर पैदा नहीं कर पा रहे हैं, जैसा की नरेंद्र मोदी ने किया था।
नेशनल हेराल्ड के मामले में निगेटिव स्थिति में होने के बाद भी कांग्रेस ने जिस तरह आक्रमण किया है, उससे उसे इसका राजनीतिक लाभ मिलता दिख रहा है। लेकिन इसे एक राजनीतिक परिणाम में तब्दील करने के लिए कांग्रेस और राहुल गांधी दोनों को कड़ी मेहनत करनी होगी। कांग्रेस को समझना होगा कि अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है, जबकि मजबूती से लड़े तो आने वाले चुनाव में उसकी स्थिति बहुत मजबूत हो सकती है।
केंद्र सरकार के मंत्रियों पर मनमोहन सिंह सरकार की तरह भ्रष्टाचार के आरोप तो नहीं लग सके हैं, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली लगातार आलोचना के घेरे में है। साथ ही, भाजपा सरकार सांप्रदायिकता के मोर्चे पर ज्यादा गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। यदि कांग्रेस सही रणनीति अपनाए तो उसे इसका लाभ मिल सकता है। उसे ध्यान रखना होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में 303 सीटों के साथ बड़ी जीत हासिल करने के बाद भी भाजपा केवल 37.36 फीसदी वोट हासिल करने में ही कामयाब हो पाई है।
अभी भी देश की 62 फीसदी से ज्यादा जनता गैर-भाजपाई विकल्प को ही अपनी प्राथमिकता बना रही है। बुरी स्थिति होने के बाद भी कांग्रेस ने लगभग 20 फीसदी वोट हासिल किया। किसी पार्टी के लिए यह बेहद मजबूत स्थिति कही जा सकती है। कांग्रेस को इस स्थिति का लाभ उठाना चाहिए। इसके लिए उसे अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाकर पूरी ताकत के साथ जुटना पड़ेगा।
राजनीतिक विश्लेषक शांतनु गुप्ता ने अमर उजाला से कहा कि कई पैमानों पर मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के अंतिम दौर की आज की स्थितियों से तुलना की जा सकती है, लेकिन कई मायनों में आज की परिस्थिति उस समय के हालात से बिल्कुल अलग है। राहुल गांधी का व्यक्तित्व लोकप्रियता के मामले में काफी ऊपर होने के बाद भी उस समय के नरेंद्र मोदी से मुकाबला नहीं कर सकती है।
उन्होंने कहा कि जब नरेंद्र मोदी को पूछताछ के लिए बुलाया गया, तब उन्होंने किसी तरह का आऱोप-प्रत्यारोप नहीं लगाया। उन्होंने कहा कि उन्हें देश की न्यायपालिका और जांच एजेंसी पर पूरा भरोसा है। वे बिना किसी तामझाम के जांच एजेंसी के कार्यालय पहुंचे और बेहद शालीनता से लगातार 11-12 घंटे तक सवालों का जवाब दिया। इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी और वे मजबूत नेता बनकर उभरे।
जबकि आज राहुल गांधी कांग्रेस नेताओँ की बड़ी टीम के साथ प्रदर्शन करके जांच एजेंसी पर दबाव बनाने का काम कर रहे हैं। एक तरह से यह जांच एजेंसी को प्रभावित करने की कोशिश है। इसका उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है। कांग्रेस का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि जब राजस्थान के चिंतन शिविर के बाद राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाने की कोशिश की जा रही थी, उसी बीच ईडी की जांच का मामला सामने आ गया। यदि इन परिस्थितियों में उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाया जाता है तो कांग्रेस को इसका लाभ होने की जगह नुकसान हो सकता है। इस परिस्थिति में G-23 के नेता पार्टी पर अपना दबाव बढ़ा सकते हैं जो पार्टी में नया अध्यक्ष लाने के लिए लगातार आवाज उठा रहे हैं।
वर्तमान सरकार की कमजोरियों का फायदा किसी दल को तभी मिल सकता है जब वह जूझने के लिए तैयार हो। कांग्रेस ने अपने नेता को बचाने के लिए जिस तरह का संघर्ष किया है, इसका एक नकारात्मक संदेश भी गया है कि वह अपने भ्रष्टाचार को ढकना चाहती है। लेकिन यदि इसी तरह का संघर्ष वह जनता के मुद्दों के लिए करे तो स्थितियां उसके पक्ष में मजबूत हो सकती हैं।