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National Doctors Day 2020: सेवा का संसार, नया मंत्र, नई शुरुआत

Wed, 01 Jul 2020 10:19 AM IST
संजीव कुमार झा परीक्षित निर्भय, अमर उजाला , नई दिल्ली
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नेशनल डॉक्टर्स डे 2020 - डॉ. मीनाक्षी भारद्वाज (चिकित्सा निदेशक, आरएमएल अस्पताल) - फोटो : amar ujala
कोरोना की शुरुआत में पहला नोडल सेंटर देश में आरएमएल को बनाया गया था। हमारे लिए सब कुछ नया था। न जांच, न इलाज। फिर भी मरीज को बचाना आसान नहीं था। हालांकि इन्फ्लूएंजा को  लेकर हमारे अनुभव यहां काम आए। हर दिन एक नया मंत्र, नई शुरुआत और दुर्गम चुनौती के साथ हमारी टीम ने मरीजों को संभाला है।

हालांकि लॉकडाउन के दौरान मरीजों की वह हालत सोचकर भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस वक्त मरीज बहुत खराब हालत में अस्पताल आ रहे थे। कई मरीज ऐसे भी हैं, जो अस्पताल आते-आते ही दम तोड़ गए। अन्य अस्पतालों से मरीजों को गंभीर स्थितियों में रेफर किया जा रहा था।

एक तरह की हाय-तौबा सी मची थी। घर, परिवार, बच्चे सबको पीछे रखते हुए एक-एक कोरोना योद्घा हर मरीज की जान बचाने में जुटा था। इन पलाें को कभी नहीं भूल सकती। अब स्थिति बेहतर है, लेकिन यह सफर बहुत कुछ सिखाकर चला गया-डॉ. मीनाक्षी भारद्वाज  चिकित्सा निदेशक आरएमएल अस्पताल

(मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज शहर की निवासी। दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज से चिकित्सकीय पढ़ाई। इसी महीने जुलाई में रिटायरमेंट।)
 
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डॉ. ऋतु सक्सेना (चिकित्सा अधीक्षक, लोकनायक अस्पताल ) - फोटो : amar ujala
सिर पर चोट लगने, बार-बार बुखार आने और परिवार का डर होने के बाद भी मैंने एक भी दिन की छुट्टी नहीं ली। देश के सबसे बड़े सेंटर में रहते हुए यहां का अनुभव एकदम अलग है। दिल्ली में दंगे होने के तुरंत बाद हमें कोरोना की नई चुनौती मिली। हमने सामान्य वार्डों को कोविड वार्ड में परिवर्तित करना शुरू किया। लेकिन यह आसान काम नहीं था।

सभी को डर था कि कोरोना न हो जाए? इस मानसिकता को हमने बदला। कई तरह के उत्पीड़न का सामना भी किया। मुझे याद नहीं कि आखिरी बार कब मैं पूरी रात सोई थी। मेरा फोन 17 मार्च से अब तक रात-दिन बजता रहता है। मैं अपने परिवार की देखभाल उस प्रकार नहीं कर पाई, जिस प्रकार करनी चाहिए। लेकिन यह वे बलिदान हैं, जिनका मुझे कोई अफसोस नहीं है, क्योंकि उन मरीजों के लिए हम एकमात्र प्रकाश के पुंज हैंः- डॉ. ऋतु सक्सेना चिकित्सा अधीक्षक, लोकनायक अस्पताल 

(देश का सबसे बड़ा कोविड सेंटर संभाल रही हैं। मूल रूप से पूर्वी दिल्ली निवासी। जोधपुर मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई। आपदा प्रबंधन में एमबीए।)
 
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डॉ. एनएन माथुर( निदेशक, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज, ईएनटी रोग विशेषज्ञ) - फोटो : amar ujala
शुरुआत और अब में बहुत अंतर है। तब हमें सब कुछ जीरो से ही शुरू करना था। मैं वह दिन कभी नहीं भूल सकता। नई जिम्मेदारियां मिली थीं और चंद दिनों में पूरी तैयारी करनी थी। लॉकडाउन में जब सब कुछ बंद था, ऐसे में महज दो सप्ताह में 60 बेड और 17 वेंटिलेटर की व्यवस्था की गई। मई में हमारे यहां ज्यादा गंभीर और बिना लक्षण वाले केस आने लगे।

अब स्थिति पहले से काफी सुकून भरी है। मरीज बढ़ रहे हैं, लेकिन काफी हद तक हमारे लिए चीजें समझ के दायरे में हैं। परिवार के साथ बैठकर समय बिताना फिलहाल कल्पना ही है। मैं जब भी उन्हें देखता हूं तो उनकी आंखों में जहां थोड़ी मायूसी होती है तो वहीं एक चमक भी है। वे मन ही मन मुझ पर गर्व करते हैं। यह अनुभव शब्दों में बयां नहीं किए जा सकते। एक-एक पल फिल्मी रील की भांति मेरे सामने चलता रहता है-डॉ. एनएन माथुर निदेशक, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज 

(ईएनटी रोग विशेषज्ञ, सफदरजंग अस्पताल में भी चिकित्सा अधीक्षक रहे। दिल्ली में चिकित्सकीय पढ़ाई। तीन दशक से दे रहे हैं सेवाएं।)
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