नेशनल क्रिएटर्स अवार्ड के तहत बेस्ट स्टोरी टेलर का अवार्ड जीतने वाली तमिलनाडु की कीर्तिका गोविंदसामी के खुद के जीवन की कहानी झकझोरने वाली है। कीर्तिका ने अपनी कहानी इंस्टाग्राम अकाउंट पर बयां करते हुए बताया बचपन में उन्हें समाज की रूढ़िवादी सोच का सामना करना पड़ा और जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों नेशनल क्रिएटर अवार्ड मिला है, उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई है।
कीर्तिका कहती हैं कि जब छोटी थीं, तो एक बार उन्हें सिर्फ इस वजह से थप्पड़ पड़ा था कि वे घर से महज 100 मीटर दूर एक दुकान तक अकेली चली गई थीं। उनके पिता इस बात से काफी नाराज और शर्मिंदा हुए, क्योंकि जिस गांव में वे पैदा हुईं, वहां लड़कियों का घर से अकेले निकलना गुनाह समझा जाता था। बहरहाल, जिस पिता ने गुस्से और शर्मिंदगी की वजह से उनसे 6 वर्ष तक बात नहीं की वही पिता आज अपनी बेटी की उपलब्धि पर गौरवान्वित होते हुए खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं। इंस्टाग्राम पर अपनी जिंदगी की कहानी को भी मर्मर्स्पर्शी अंदाज में बयां करते हुए लिखा, जब 5 साल की थी, तो पिता को रोते हुए देखा, क्योंकि गांव के लोग उन्हें बुरा-भला कह रहे थे। वजह घर से अकेले बाहर निकलना था। ऐसा नहीं था कि किसी लड़के के चक्कर में घर से रफूचक्कर हो गई थी, बस घर से 100 मीटर दूर की दुकान तक भी अकेले जाने का गुनाह किया था। पिता जीवनभर इस वजह से शर्मिंदा महसूस करते रहे।
जब कहा गया...शादी के लिए स्नातक काफी
हर बुनियादी चीज के लिए भी जीवनभर संघर्ष करना पड़ा। पुरातत्ववेत्ता बनने के लिए इतिहास से स्नातक किया, लेकिन जब स्नातक हुआ, तो आगे की पढ़ाई के दरवाजे बंद कर दिए गए और कहा गया कि शादी करने के लिए स्नातक की पढ़ाई पर्याप्त है। उस दिन अपनी बेबसी पर खूब रोना आया। लेकिन, अपनी जिंदगी को इस दायरे में सीमित नहीं रखना चाहती थी। घर के बाहर निकलने के बजाय घर के अंदर रहकर अवसरों की तलाश शुरू की और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर बनने के लिए 1.5 साल तक ट्यूशन, इलेक्ट्रिशियन, रिसेप्शनिस्ट जैसे तमाम काम किए और आखिर एक सेकंड हैंड लैपटॉप खरीदी और कीर्ति हिस्ट्री की शुरुआत हुई।
समाज और रिश्तेदारों का दबाव, फिर भी माता-पिता ने साथ दिया
कीर्तिका कहती हैं कि वे अपने माता-पिता को अपने हालात के लिए जिम्मेदार नहीं मानती हैं, क्योंकि उन्होंने उनके दायरे में जो भी संभव था सब किया। लेकिन, गांव में माता-पिता को समाज और रिश्तेदार के दबाव में फैसले लेने होते हैं।