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नारी शक्ति वंदन विधेयक पारित होना आसान या आएगी मुश्किल?: सरकार और विपक्ष के पास कितना संख्या बल, जानें

Thu, 16 Apr 2026 02:04 PM IST
Kirtivardhan Mishra स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र की शुरुआत हो चुकी है। केंद्र सरकार इस सत्र में महिला आरक्षण को लागू करने के लिए विधेयक पेश कर चुकी है। केंद्र सरकार इसे महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में आरक्षण बढ़ाने के लिए जरूरी कदम बताया है। इस विशेष सत्र सरकार दो और विधेयक पेश कर रही है। इसमें एक विधेयक मौजूदा 543 लोकसभा सीटों को बढ़ाने के लिए है, जबकि एक और विधेयक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में महिला आरक्षण लागू करने और उनमें सीट बढ़ाने का प्रस्ताव है। 
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नारी शक्ति वंदन विधेयक पर सत्तापक्ष बनाम विपक्ष। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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संसद का विशेष सत्र गुरुवार से शुरू हो गया। तीन दिन तक चलने वाले इस सत्र में केंद्र सरकार की तरफ से तीन विधेयक पेश किए गए हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम और परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर पूरे देश की नजर है। इसे लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच रार छिड़ी है। 
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चूंकि संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण लाने और सीटों को बढ़ाने के लिए संविधान के कुछ प्रावधानों में संशोधन की जरूरत होगी, इसलिए इसे संविधान संशोधन प्रस्ताव कहा जा रहा है। ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर नए विधेयकों को पारित कराने के लिए किस पक्ष के पास कितना संख्याबल है और क्या मौजूदा स्थिति में यह विधेयक पारित हो सकते हैं? आइये जानते हैं...

क्या है संविधान संशोधन विधेयक के पारित होने से जुड़े नियम?

संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया और नियम संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत परिभाषित है। महिला आरक्षण और सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए लाए जा रहे विधेयकों को देखा जाए तो इसके लिए संविधान में बदलाव की जरूरत होगी। इसके लिए कुछ विशेष नियम हैं।

1. विशेष बहुमत

किसी भी संविधान संशोधन विधेयक (जैसे- संविधान 131वां संशोधन विधेयक) को संसद के दोनों सदनों- लोकसभा और राज्यसभा में विशेष बहुमत से पारित होना अनिवार्य है। विशेष बहुमत का मतलब है...



जहां आसान बहुमत (सिंपल मैजोरिटी) के जरिए किसी भी विधेयक को 50 फीसदी से ज्यादा सदस्यों की सहमति से पारित कराया जा सकता है, वहीं संविधान में बदलाव के प्रस्तावों के लिए यह विशेष बहुमत जरूरी है। 

2. आधे राज्यों की सहमति

यदि कोई संविधान संशोधन देश के संघीय ढांचे, शक्तियों के बंटवारे, या संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व को बदलता है, तो संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ देश के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की तरफ से भी इसे साधारण बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक होता है। हालांकि, हर संविधान संशोधन में यह जरूरी नहीं है। आधे राज्यों की सहमति सिर्फ संविधान के मूलभूत ढांचे में बदलाव की स्थिति में लागू होती है। 

संविधान संशोधन विधेयक होने की वजह से महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयक को कानून बनाने के लिए पहले चरण में इसे संसद में पारित कराना होगा। शर्त यह है कि मतदान के लिए सदन के 543 कुल सदस्यों में से कम से कम सदन के 50 फीसदी सदस्य (272) मौजूद होने ही चाहिए। साथ ही इसे पारित कराने के लिए विशेष बहुमत यानी सदन में मौजूद सदस्यों का दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन की जरूरत होगी। यानी करीब 362 सांसदों के समर्थन की जरूरत।

ये भी पढ़ें: संसद के विशेष सत्र पर क्यों मची रार?: आरक्षण नहीं, परिसीमन विधेयक पर विपक्ष कर रहा विरोध, जानें और क्या विवाद

मौजूदा विधेयक और संसद में संख्या बल की चुनौती

संविधान संशोधन के लिए जरूरी विशेष बहुमत के नियम की वजह से ही सत्ता पक्ष को विपक्ष के समर्थन की आवश्यकता पड़ रही है।


लोकसभा में क्या होगा जादुई आंकड़ा?

543 सदस्यों की प्रभावी क्षमता के साथ दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा लगभग 362 है। मौजूदा समय में लोकसभा में 540 सांसद हैं। यानी अब जादुई आंकड़ा 360 हो जाता है।

लोकसभा में अगर एनडीए का संख्याबल देखें तो सामने आता है कि उसके पास फिलहाल 293 सांसद हैं। इनमें अकेले भाजपा के पास 240 सांसद हैं। इसके बाद दो और पार्टियों- तेदेपा और जदयू के पास क्रमशः 16 और 12 सीटें हैं। वहीं, शिवसेना के पास सात और लोजपा के पास पांच सांसद हैं। इन पांच पार्टियों को ही मिला दें तो एनडीए बहुमत के आंकड़े के पार पहुंच जाता है। वहीं, छोटी-बड़ी सभी पार्टियों का साथ रहने पर 293 वोट एनडीए को मिलना तय हैं। यानी उसे 67 अन्य सदस्यों के सहयोग की जरूरत पड़ सकती है। 

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दूसरी तरफ विपक्षी इंडिया गठबंधन के पास 235 सीटें हैं, जो कि भाजपा से भी पांच सीट कम हैं। इनमें कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, जिसके पास 98 सीटें हैं। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के पास 37, तृणमूल कांग्रेस के पास 28 और डीएमके के पास 22 सीटें हैं। गठबंधन की बाकी पार्टियों के पास 10 से कम सीटें हैं। यानी अगर विपक्ष एकजुट रहता है तो इस विधेयक की राह मुश्किल हो सकती है। 

इन नियमों के चलते, वोटिंग के दौरान विपक्ष द्वारा सदन का बहिष्कार करने या मतदान से दूर रहने की स्थिति में भी सरकार के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाना मुश्किल हो सकता है।


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