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नेपोलियन बोनापार्ट का गहना था जोखिम उठाना, कभी हताश और निराश नहीं होते थे

Sun, 09 Sep 2018 07:21 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Napoleon Bonaparte
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नेपोलियन बोनापार्ट जीवन भर जोखिम भरे काम करते रहे।  एक बार उन्होंने आलपास पर्वत को पार करने का ऐलान किया और फिर अपनी सेना के साथ पर्वत को पार करने के लिए चल पड़े। 
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जब वह निकले तो सामने एक विशाल और गगनचुम्बी पहाड़ खड़ा था, जिस पर चढ़ाई करना असंभव प्रतीत हो रहा था। नेपोलियन की सेना में अचानक हलचल शुरू हो गई। सभी को पहाड़ पर चढ़ने में डर लग रहा था लेकिन नेपोलियन से अपनी सेना को चढ़ाई का आदेश दिया।

जब नेपोलियन सेना को आदेश दे रहा था तो उसके पास एक बूढ़ी औरत आई और उसने कहा, क्यों खुद मरना चाहते हो और अपनी सेना को भी ऐसा करने के लिए बोल रहे हो। मैं तुम्हें बताना चाहती हूं कि यह आत्महत्या करने जैसा है। यहां जितने भी लोग आएं हैं वो मुंह की खाकर यहीं रह गए। अगर तुम्हें अपनी जिंदगी से प्यार है तो वापस चले जाओ। बूढ़ी औरत ने जैसे ही बोनापार्ट को लौटने की सलाह दी वह दुगुनी तेजी से पहाड़ पर चढ़ने की तैयारी करने लगे। उस औरत की बात सुनकर नेपोलियन नाराज नहीं हुए बल्कि प्रेरित हो गए और झट से  अपने गले में पड़े हीरों का हार उतारकर उस बुजुर्ग महिला को पहना दिया। 
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नेपोलियन बहुत उत्साहित होकर कहा, आपने मेरा उत्साह दोगुना ही नहीं किया है बल्कि मुझे प्रेरित कर दिया है अब मैं जरूर चढ़ाई करूंगा और फतह भी हासिल करूंगा। मैं आपकी नकारात्मक बात से बिल्कुल भी डिगा नहीं हूं। 

साथ ही नेपोलियन ने कहा कि मैं अगर जिंदा बचा और वापस आया तो आप मेरी जय-जयकार करना। उस औरत ने नेपोलियन की बात सुनकर कहा- तुम पहले इंसान हो जो मेरी बात सुनकर हताश और निराश नहीं हुए, वरना तो कई लोग ऐसे भी मिले जो बात सुनकर उल्टे पैर वापस लौट गए थे।  जो करने या मरने  और मुसीबतों का सामना करने का इरादा रखते है, वह लोग कभी नही हारते। नेपोलियन बोनापार्ट एक महान योद्धा थे और उनकी कहानी बुलंद हौसले का पाठ पढ़ाती है। 
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नेपोलियन बोनापार्ट को इतिहास के महानतम योद्धाओं में गिना जाता है। वाटरलू की लड़ाई में उनकी हार के बाद न केवल उनकी बल्कि पूरे यूरोप की किस्मत बदल गई।  पिछले दिनों आए एक शोध से पता चला कि इंडोनेशिया के सुंबावा द्वीप में 1815 में हुआ एक ज्वालामुखी विस्फोट और इसके चलते वैश्विक मौसम का खराब होना वाटरलू की लड़ाई में नेपोलियन की हार के लिए  जिम्मेदार रहा होगा। 

ब्रिटेन के इंपीरियल कॉलेज लंदन के शोधार्थियों के अनुसार इतिहासकार यह जानते हैं कि बारिश और जमीन पर कीचड़ की मौजूदगी वाली परिस्थितियों ने गठबंधन सेना को नेपोलियन को हराने में मदद की थी। जून 1815 में हुई वाटरलू की लड़ाई से ठीक दो महीने पहले ही इंडोनेशिया के सुंबावा द्वीप में माउंट टैम्बोरा नाम के ज्वालामुखी में विस्फोट हुआ था, जिससे 1,00,000 लोगों की मौत हो गई थी। वर्ष 1816 में गर्मियों का मौसम भी नहीं आया था।
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